संघर्ष संवाद
Sangharsh Samvad

नियत अवधि रोजगार को वैध करना, 12 घंटे का कार्य-दिवस मजदूरों को गुलाम बनाने और युवाओं के भविष्य को नष्ट करने की साज़िश: SKM

संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) चारों श्रम संहिताओं को महिमामंडित करने के लिए किए जा रहे झूठे कॉरपोरेट प्रचार की कड़े शब्दों में निंदा करता है। SKM संयुक्त ट्रेड यूनियन आंदोलन के दृढ़ विरोध और संघर्ष का पूर्ण समर्थन करता है, जो श्रम संहिताओं को रद्द कर अधिकारों की बहाली और अन्य बुनियादी मांगों के लिए लड़ रहा है।

प्रधानमंत्री का यह दावा कि श्रम सहिन्ताएं  सभी श्रमिकों को न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं, पूरी तरह बेबुनियाद है। 90% से अधिक मजदूर जो असंगठित क्षेत्र में हैं, श्रम संहिताओं के दायरे से बाहर हैं। अब श्रम संहिताओं ने संगठित क्षेत्र के 90% मजदूरों को भी कानूनी संरक्षण से बाहर कर दिया है।

इंडस्ट्रियल रिलेशन्स कोड अब 300 से कम श्रमिकों वाले यूनिट्स को छंटनी, सेवा समाप्ति और बंदी के लिए पहले से सरकारी अनुमति लेने से सामान्यतः मुक्त कर देता है, जबकि पहले यह सीमा 100 श्रमिक थी।

इसी तरह 20 या 40 से कम श्रमिकों वाले (बिजली उपयोग के आधार पर) उद्योग व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियाँ (OSHWC) कोड के कई प्रावधानों एवं कारखाने के रूप में पंजीकरण से मुक्त हैं, जो पहले 10 और 20 थे।

वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण (ASI) 2021–22 के आंकड़ों के अनुसार 100 से कम श्रमिकों को रोजगार देने वाले कारखाने सभी कारखानों का 79.2% हिस्सा हैं।

असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन या सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई प्रवर्तन तंत्र मौजूद नहीं है। केंद्र सरकार ट्रेड यूनियनों की ₹26,000 प्रति माह न्यूनतम वेतन की मांग स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

SKM मांग करता है कि सरकार स्पष्ट करे – वर्तमान में न्यूनतम वेतन क्या है, कितने श्रमिकों को मिलता है, और देश भर में इसके प्रवर्तन की क्या व्यवस्था है।

SKM संयुक्त ट्रेड यूनियन आंदोलन के साथ मिलकर श्रम संहिताओं के बारे में सरकार की इस छलपूर्ण और भ्रामक प्रचारबाज़ी का पर्दाफाश करेगा।

सूचित श्रम संहिताएँ मजदूरों के ट्रेड यूनियन बनाने और हड़ताल करने के अधिकार को भी नकार देती हैं। 60 दिन पहले अनिवार्य नोटिस की शर्त और समझौता प्रक्रिया चलने के दौरान हड़ताल पर प्रतिबंध – मिलकर हड़ताल को लगभग असंभव कर देते हैं और संघ बनाने की स्वतंत्रता छीन लेते हैं।

यह मोदी सरकार की कॉरपोरेट वर्ग के आगे पूर्ण सरेंडर है और श्रमिकों के विधिक अधिकारों के विरुद्ध है। देश की जनता इसे स्वीकार नहीं करेगी।

भाजपा, RSS और BMS के नेतृत्व को स्पष्ट करना होगा कि वे कॉरपोरेट के साथ खड़े हैं या भारत की जनता के साथ। मोदी सरकार ने कॉरपोरेट एकाधिकारों के दबाव में कामकाजी जनता और नौजवान पीढ़ी के साथ धोखा किया है। श्रम संहिताओं ने स्थायी रोजगार और सुरक्षा के अधिकार की जगह नियत अवधि रोजगार को वैध बना दिया है और 1970 के ठेका श्रम उन्मूलन अधिनियम को अप्रभावी कर दिया है।

सरकार ने 8 घंटे के कार्यदिवस – जो श्रमिकों का सार्वभौमिक अधिकार है – को खत्म कर 12 घंटे के कार्यदिवस को वैध कर दिया है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 42 में उल्लेखित न्यायपूर्ण और मानवीय कार्य परिस्थितियों के विपरीत है। श्रम संहिताएँ मजदूरों को पूँजी के गुलाम बनाने, युवाओं का भविष्य नष्ट करने और बुज़ुर्ग मजदूरों को सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित कर दुखद जीवन की ओर धकेल देने के लिए बनाई गई हैं – इन्हें रद्द करना ही होगा।

श्रम संहिताओं को अंतिम रूप देने से पहले ट्रेड यूनियनों के सुझाव और सिफारिशें बिल्कुल नहीं मानी गईं। भारतीय श्रम सम्मेलन (ILC) – जो एक महत्वपूर्ण त्रिपक्षीय परामर्श मंच है – वर्ष 2015 से आयोजित नहीं किया गया है। कामकाजी जनता पर कॉरपोरेट वर्चस्व थोपने का यह बेहद अलोकतांत्रिक तरीका स्वीकार्य नहीं है।

SKM श्रमिक–किसान एकता को जनस्तर तक मजबूत करने की अपील करता है ताकि श्रम संहिताओं की वापसी तक व्यापक, शांतिपूर्ण और लंबे संघर्ष संगठित किए जा सकें। SKM श्रम संहिताओं की प्रतियां जलाने का आह्वान करता है और सभी से अपील करता है कि 26 नवंबर 2025 को SKM और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों व सेक्टरल फेडरेशनों के संयुक्त मोर्चे सहित अन्य मजदूर और कृषि मजदूर संगठनों द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शनों में भाग लें।

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जारीकर्ता
मीडिया सेल | संयुक्त किसान मोर्चा (SKM)