संघर्ष संवाद
Sangharsh Samvad

घरेलू हिंसा: घर की चुप्पी में दम तोड़ती आधी आबादी

भारत में घरेलू महिला हिंसा की ताज़ा तस्वीर गहरी चिंता पैदा करती है। WHO और NCRB के आँकड़े बताते हैं कि हर तीसरी महिला अपने ही साथी की हिंसा का शिकार होती है, लेकिन दर्ज मामले वास्तविक पीड़ा का छोटा हिस्सा हैं। सामाजिक कलंक, आर्थिक निर्भरता और चुप्पी की परंपरा मिलकर हिंसा को घर की दीवारों के भीतर छुपा देती हैं हमारी संवेदनशीलता पर तीखा सवाल छोड़ते हुए संध्या राजपुरोहित के इस लेख को यहां सप्रेस फीचर्स से साभार प्रकाशित किया जा रहा है- संपादक
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देश में घरेलू महिला हिंसा की ताज़ा तस्वीर बेहद चिंताजनक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की हालिया रिपोर्ट बताती है कि भारत में लगभग हर तीसरी महिला अपने जीवन के किसी न किसी पड़ाव पर अपने ही जीवनसाथी द्वारा की गई हिंसा का सामना करती है। यह आंकड़ा केवल एक सांख्यिक संकेत नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संवेदना पर एक गहरा प्रश्न है एक ऐसा दस्तावेज़, जो घर की चारदीवारी में दबा दिया जाता है और बाहर की मुस्कान के पीछे छुपा रहता है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की नवीनतम रिपोर्ट इस पीड़ा की विडंबना को और व्यापक बनाती है। वर्ष 2023 में महिलाओं के खिलाफ 4.48 लाख से अधिक अपराध दर्ज हुए, जिनमें पति और रिश्तेदारों द्वारा की गई क्रूरता यानी घरेलू हिंसा सर्वाधिक है। राष्ट्रीय महिला आयोग को 2024 में मिली शिकायतों में भी घरेलू हिंसा का स्थान सबसे ऊपर रहा। और फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि यह केवल वह हिस्सा है जो दर्ज हो पाया है; वे अनगिनत आवाज़ें अब भी घरों की चुप्पी में कैद हैं, जो सामाजिक कलंक और आर्थिक निर्भरता के कारण सामने नहीं आ पातीं। यह स्थिति बताती है कि घरेलू हिंसा महज़ कानून और अपराध की समस्या नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक जड़ता है जो आज भी लाखों महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा को चुनौती देती है।

यह तस्वीर हमारे सामाजिक ढांचे में मौजूद उस दरार को भी उजागर करती है, जहाँ रिश्तों के नाम पर सहनशीलता को संस्कार बताया जाता है और संरक्षण के नाम पर स्त्री के हिस्से में मौन का बंधन आता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत की 15 से 49 वर्ष आयु-वर्ग की लगभग बीस प्रतिशत महिलाओं ने केवल वर्ष 2023 में ही अपने अंतरंग साथी द्वारा की गई हिंसा का अनुभव किया। अपने ही घर में, अपने ही विश्वस्त साथी द्वारा की गई हिंसा किसी भी सभ्य समाज की असफलता का सबसे स्पष्ट प्रमाण है। यह हमारे उन नैतिक और पारिवारिक मूल्यों पर भी प्रश्न खड़ा करती है, जिन्हें हम गर्व से “भारतीय संस्कार” कहते हैं।

घरेलू हिंसा को आमतौर पर शारीरिक उत्पीड़न की संकीर्ण परिभाषा में बाँध दिया जाता है, जबकि सच्चाई इससे कहीं आगे जाती है। अपमान, उपेक्षा, अविश्वास ये मानसिक हिंसा हैं। आवाज़ दबा देने वाली तिरस्कारपूर्ण चुप्पी, आत्मसम्मान को चोट पहुँचाने वाले ताने ये भावनात्मक हिंसा हैं। आर्थिक निर्भरता को हथियार बनाना यह वित्तीय हिंसा है। और सहमति को महत्व न देना यौनिक हिंसा है। कई बार यह हिंसा सामाजिक रूप ले लेती है, जब महिला को अपनों से अलग कर दिया जाता है या उसे परिवार के बीच ही अपमानित किया जाता है। यह धीमी, भीतर से तोड़ने वाली प्रक्रिया स्त्री के भीतर ऐसी दरारें भर देती है, जिन्हें बाहर से देख पाना आसान नहीं होता।

ऐसी परिस्थितियों को देखते हुए वर्ष 2005 में लागू हुआ घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस कानून ने पहली बार स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा केवल मारपीट नहीं, बल्कि मानसिक, आर्थिक, भावनात्मक और यौन हिंसा भी है। इसने पीड़िता को संरक्षण आदेश, निवास के अधिकार, भरण-पोषण, मेडिकल सहायता, काउंसलिंग, और आवश्यक होने पर सुरक्षा कर्मी उपलब्ध कराने की व्यवस्था दी। कई राज्यों में प्रोटेक्शन ऑफिसर, वन-स्टॉप सेंटर और हेल्पलाइन सेवाओं ने हजारों महिलाओं तक पहुँच बनाई है। अनेक मामलों में यह कानून उनके लिए जीवन और मृत्यु के बीच निर्णायक सहारा साबित हुआ है।

लेकिन कानून अपनी जगह है और समाज अपनी जगह। घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम ने जो ढांचा पेश किया, वह जितना आश्वासक है, उसका क्रियान्वयन उतना ही सीमित। प्रोटेक्शन ऑफिसरों की कमी, पुलिस और न्यायिक तंत्र की सुस्ती, और पितृसत्तात्मक रवैये ने इस कानून की प्रभावशीलता को बाधित किया है। कई महिलाएँ शिकायत तक दर्ज नहीं कर पातीं; और जो करती हैं, उन्हें कानूनी प्रक्रिया की जटिलता और सामाजिक आलोचना का सामना करना पड़ता है। इसलिए कानून ने रास्ता तो खोला है, पर उस रास्ते पर चलने के लिए अभी भी साहस से अधिक व्यवस्था की आवश्यकता है। यह साफ़ है कि जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी, तब तक कोई भी कानून पूरी तरह कारगर नहीं हो सकता।

दुनिया का परिदृश्य भी कुछ अलग नहीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, विश्वभर में लगभग 84 करोड़ महिलाएँ अपने जीवन में कभी न कभी शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार हो चुकी हैं। यह एक वैश्विक महामारी है लेकिन भारत में इसकी प्रकृति सामाजिक और सांस्कृतिक जटिलताएँ लेकर और कठोर रूप धारण कर लेती है। बचपन से सहन करने की सीख, विवाह को अंतिम लक्ष्य मान लेने की मानसिकता, और “घर की बात घर में रहे” का घातक सिद्धांत ये सभी घरेलू हिंसा को सबसे स्थायी आश्रय देते हैं।

क़ानूनों की मौजूदगी के बावजूद, हिंसा का यह चक्र तब तक नहीं टूटेगा जब तक समाज स्त्री को पूर्ण व्यक्ति की तरह न देखे न कि किसी की “जिम्मेदारी”, “इज़्ज़त” या “सम्पत्ति” की तरह। स्त्री की शिक्षा, उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता और उसके अधिकारों के प्रति जागरूकता ही वह आधार हैं जिनपर हिंसा-मुक्त समाज की इमारत खड़ी हो सकती है।

संयुक्त राष्ट्र ने 2030 तक महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार की हिंसा समाप्त करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन मौजूदा गति चेतावनी देती है कि अगर सोच, नीतियों और क्रियान्वयन में तेज़ बदलाव नहीं हुए, तो यह लक्ष्य केवल वैश्विक घोषणाओं तक सिमट जाएगा। सवाल अब यह नहीं है कि समस्या क्या है सवाल यह है कि हम समाधान को लेकर कितने गंभीर हैं। क्या हम आँकड़ों को पढ़कर आगे बढ़ जाएँगे, या उनसे बदलाव की आवाज़ निकालेंगे? क्या हम कानूनों के निर्माण पर संतुष्ट रहेंगे, या उनके क्रियान्वयन पर भी समान कठोरता से नज़र रखेंगे?

किसी समाज की प्रगति उसकी चमचमाती सड़कों या ऊँची इमारतों से नहीं, उसकी सुरक्षित महिलाओं से मापी जाती है। और जब तक कोई स्त्री अपने ही घर में भय के साए में जीने को मजबूर है, तब तक विकास की कोई भी परिभाषा अधूरी है। अब आवश्यकता संवेदना से आगे बढ़कर संकल्प की है मौन को तोड़ने की, हस्तक्षेप करने की, और केवल कानून लिखने की नहीं, न्याय को सुनिश्चित करने की। क्योंकि जहाँ स्त्री भय में रहती है, वहाँ सभ्यता केवल एक दिखावा रह जाती है।