संघर्ष संवाद
Sangharsh Samvad

सरकार-कोरपोरेट का गठजोड़: पोस्को विरोधी आंदोलनकारियों पर कातिलाना हमला, 10 किसान गिरफ़्तार

3 फ़रवरी, 2013 को सुबह के लगभग 4 बजे 12 प्लाटूनों से नुआगांव में पोस्को संयंत्र का विरोध कर रहे स्थानीय लोगों पर हमला बोल दिया. इस कतिलाना हमले में कई महिला-बच्चें-बुजर्गों के घायल होने की खबर आई हैं. हमले के बाद घरों में सो रहे पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के कम से कम 10-12 स्थानीय किसानों को गिरफ्तार कर लिया गया है। जबरन भूमि-अधिग्रहण के लिय…
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एक बूँद पानी भी अभिजीत ग्रुप के प्लांट को नहीं देंगे : किसानों का ऐलान

बिहार के बाँका जिले में चन्दन नदी पर लक्ष्मीपुर (बौंसी प्रखण्ड) में केवल सिंचाई कार्य के लिए करीब 40 वर्ष पूर्व…

दमनकारी कानूनों के विरूद्ध: सम्मेलन

गुजरी 20 जनवरी को चंडीगढ़ में गदर आंदोलन की 100वीं बरसी के अवसर पर दमनकारी कानून विरोधी कमेटी, चंडीगढ़ के बैनर तले दमनकारी कानूनों के खिलाफ एक दिवसीय सम्मलेन का आयोजन किया गया। सम्मलेन में राजविन्द्र सिंह बैंस एडवोकेट (पंजाब ह्यूमैन राइट आर्गेनाइजेशन, पीएचआरओ), प्रो. जगमोहन सिंह (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट, पंजाब, एएफडीआर ), पंकज त्यागी (पीपुल्स…
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जिंदल, जंगल और जनाक्रोश: 2008 का पुलिस दमन नहीं भूलेंगे रायगढ़ के लोग

रायगढ़ में 5 जनवरी को काला दिवस मनाया गया। यह आयोजन 2009 से हर साल इसी तारीख को मनाया जाता है ताकि 2008 में…

किसानों की बेबसी बनाम सरकारी बेदिली

देश की राजधानी से मुश्किल से 250 कि.मी. की दूरी पर किसान अपनी ज़मीन बचाने के लिए लगातार 876 दिनों से धरने पर बैठे है। इन किसानों की 72 हजार बिघा ज़मीन नवलगढ़ (झुंझुनू, राजस्थान) में प्रस्तावित 3 सीमेंट प्लांटों में जा रही है। कई बार बंद, प्रदर्शन, रैली और धरने जैसे आयोजन कर सरकार को चेतावनी दे चुके किसानों का कहना है कि हम अपनी जान दे देंगे,…
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‘1885 के बाद अफ्रीका को लूटने का यह नया सिलसिला है’

पिछले दिनों जर्मनी में ‘एफेक्टिव कोऑपरेशन फॉर ए ग्रीन अफ्रीका’ के जर्मनी में आयोजित पहले अधिवेशन में ओबांग मेथो…

कारपोरेट लूट- पुलिसिया दमन के विरोध में दुर्ग में दस्तक: किसान-मजदूर-आदिवासियों ने…

कंपनियों की जागारी नहीं, छत्तीसगढ़ हमारा है! लाठी गोली की सरकार नहीं चलेगी, नहीं चलेगी!! …

मंत्री जी, देश की वनभूमि पर कारपोरेट का जंगलराज कायम हो गया है !

देश आज उस मुहाने पर खड़ा है जहां या तो जंगल बचाने वाले आदिवासी बचेंगे, या जंगलराज लाने वाले कारपोरेट. देश का क़ानून और संविधान कारपोरेट हितों का अभयारण्य बन गया है. वनभूमि-हस्तांतरण को रोकने के लिए 2006 में क़ानून तो बना, लेकिन जब इसे लागू करने के लिए ज़रूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति कंपनियों के आगे घुटने टेक देती हो तो हिमाचल हो या ओडीसा, छत्तीसगढ़ हो…
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