संघर्ष संवाद
Sangharsh Samvad

हिमाचल: मंडी की जनसुनवाई में आपदा पीड़ितों ने अपनी पीड़ा और नाराज़गी का किया इज़हार

15 नवम्बर 2025 को मंडी के साक्षरता भवन में राज्य के अलग-अलग जिलों मंडी, कांगड़ा, कुल्लू, किन्नौर और लाहौल से आए 70 से अधिक आपदा प्रभावित लोगों ने एक दिन की जनसुनवाई में अपनी समस्याएं  एक स्वतंत्र सात-सदस्यीय पैनल के सामने रखीं। यह कार्यक्रम हिमाचल के कई जनसंगठनों की ओर से आयोजित दो-दिवसीय जनता संवाद का हिस्सा था।

लगभग सभी वक्ताओं ने बताया कि राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया बेहद धीमी, अपारदर्शी और गैर-जवाबदेह है। कई लोगों को शुरुआती राहत के रूप में 1.30 लाख रुपये मिले, लेकिन मकानों और खेतों के नुकसान की पूरी क्षतिपूर्ति अब तक अटकी हुई है। सर्वे में नाम दर्ज करने और हटाने में अनियमितताएँ सबसे अधिक सामने आयीं।

सिराज से केसरी देवी सहित छह महिलाओं ने बताया कि सर्वे सूची में बदलाव बिना जानकारी और कारण बताए किए गए। किराया राहत को लेकर भी बड़ी शिकायतें आयीं। कई परिवारों से कहा गया कि जब तक वे राहत शिविर में न रहें, तब तक उन्हें किराया मदद नहीं मिलेगी।

स्पेशल रिलीफ़ पैकेज (SRP) की पात्रता को लेकर भी गम्भीर सवाल उठे। जिन परिवारों के पैतृक घर कहीं दूर गाँवों में हैं, उन्हें यह कहकर हटाया गया कि उनके पास “वैकल्पिक घर” है, जबकि वे वही घर खो चुके हैं जिसमें वे वास्तव में रहते थे। संयुक्त परिवारों से अलग हुए नए छोटे परिवारों को भी अलग इकाइयों की तरह नहीं माना जा रहा। सबसे अधिक नुकसान अकेली और एकल महिलाओं को हो रहा है, जिनके छोटे आश्रय नष्ट हो गए लेकिन उन्हें सूची में जगह नहीं मिली।

चौकी बलाड़ी के नीटू कुमार ने मलाना डैम फटने से हुए नुकसान की बात रखी। उनका घर उजड़ गया, लेकिन आज तक उन्हें कोई राहत नहीं मिली है।

एक बड़ा मुद्दा भूमिहीन प्रभावित परिवारों के पुनर्वास का रहा। जोगिंदरनगर, बुंगरेल चौक (सिराज) और लिंडुर (लाहौल) से आए लोगों ने बताया कि घर unsafe घोषित होने के बाद दोबारा निर्माण पर रोक है, लेकिन नई ज़मीन उपलब्ध नहीं। अधिकतर ज़मीन वन विभाग के अधिकार क्षेत्र में होने से केंद्र की मंज़ूरी ज़रूरी है, जो वर्षों तक अटक जाती है। लोगों ने कहा—“जब लौटकर घर बनाना भी मना है, तो हम जाएँ कहाँ?”

कुल्लू, किन्नौर और मंडी के वक्ताओं ने अनियोजित सड़क कटिंग, जंगल कटाई, मलबा फेंकने और बड़े बांधों व सड़क परियोजनाओं को आपदाओं की वजह बताया। मंडी शहर में इस साल आई कई घटनाओं को भी इसी लापरवाही से जोड़ा गया।

स्वतंत्र पत्रकार और अधिवक्ता रजनीश शर्मा ने न सिर्फ बच्चों की शिक्षा पर पड़े असर जैसे, लंबी दूरी तय कर स्कूल जाने की मजबूरी और कई गाँवों में प्राथमिक स्कूलों के बंद रहने की घटना को उजागर किया, बल्कि पुनर्निर्माण कार्यों में राजनीतिक दखलअंदाज़ी की भी कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि आपदा राहत और पुनर्निर्माण लोगों का अधिकार है, न कि राजनीतिक प्रभाव या पक्षपात का माध्यम। उन्होंने राज्य सरकार से आपदा कोष के उपयोग में पूरी पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की।

लाहौल से सुनीता कटोच ने जलवायु परिवर्तन के गंभीर असर, ग्लेशियरों के पिघलने और जहालमा जैसी नालों में बार-बार आते फ्लैश फ्लड और इसके सामाजिक प्रभावों का मुद्दा उठाया। कुल्लू के लालचंद कटोच ने बेतरतीब पर्यटन और बहुराष्ट्रीय स्की विलेज जैसे विनाशकारी प्रोजेक्टों के खिलाफ जनता के पुराने संघर्षों को याद किया और कहा कि संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों की रक्षा के लिए समाज को एकजुट होना होगा।

मंडी के डीएम, जो कुछ देर मौजूद रहे, ने भूमि-हीन पुनर्वास को महत्वपूर्ण बताया और कहा कि मामला राज्य सरकार केंद्र से उठा रही है। पैनल के सदस्य – गुमान सिंह, जिया लाल नेगी, दीपेंदर मनटा, विमला विश्वप्रेमी, निर्मल चंदेल, चंद्रकांता और मानशी आशर आने वाले दिनों में जान सुनवाई पर रिपोर्ट तैयार कर सरकार को पेश करेंगे।

यह उन सुनवाई निम्नलिखित संगठनों द्वारा आयोजित दो दिवसीय चर्चा का हिस्सा थी: एकल नारी शक्ति संगठन, भूमि अधिग्रहण प्रभावित मंच, हिमालय नीति अभियान, हिमलोक जागृति मंच, हिमाचल ज्ञान-विज्ञान समिति, हिमधरा पर्यावरण समूह, जीभी वैली टूरिज्म डेवलपमेंट एसोसिएशन, लोकतंत्र, लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण अभियान, मंडी साक्षरता समिति, पीपल फॉर हिमालय अभियान, पर्वतीय महिला अधिकार मंच, सामाजिक-आर्थिक समानता जन अभियान, सेव लाहौल-स्पीति, टावर लाइन प्रभावित मंच।

 

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