संघर्ष संवाद
Sangharsh Samvad

नये श्रम कानून न केवल मज़दूरों पर हमला है बल्कि कानून के शासन पर मौलिक आघात है: NTUI

न्यू ट्रेड यूनियन इनिशिएटिव (एन.टी.यू.आई) ने मोदी सरकार द्वारा थोपे गए  चारों श्रम संहिताओं की कड़ी निंदा की है। एन.टी.यू.आई ने अपने वेबसाइट पर इन श्रम संहिताओं को अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक करार दिया है। यूनियन ने कहा है कि-  यह कदम  न केवल मज़दूरों पर हमला है बल्कि कानून के शासन पर मौलिक आघात है। साथ ही एन.टी.यू.आई ने जनता से इन श्रम संहिताओं का पुरजोर विरोध करने की अपील किया है।

गौरतलब है कि केंद्र की मोदी सरकार द्वारा 21 नवंबर 2025 को कार्यपालिका के आदेश के माध्यम से इन नये चार श्रम संहिताओं को देश भर में लागू करने का आदेश जारी किया गया था।

यूनियन द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि,  भारतीय जनता पार्टी हमेशा की तरह घरेलू और वैश्विक पूंजी के साथ मिलकर, कथित ‘इज़ ऑफ डूइंग बिजनेस’ (व्यापार की सुविधा) के नाम पर मज़दूरों के अधिकार रौंद रही है। ये श्रम संहिताएं हमारे संविधान में निहित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती हैं और उन संवैधानिक मूल्यों का हनन करती हैं जो हमारे मुल्क में श्रम, लोकतंत्र और संघवाद को नियंत्रित करते हैं। संहिताएं संरचनात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण हैं, कानूनी रूप से असंगत हैं, और मज़दूरों के अधिकारों को खोखला करने के लिए बनाई गई हैं।

मौलिक अधिकारों का उल्लंघन

1. अनुच्छेद 14 का उल्लंघन (मनमानापन और असमान सुरक्षा)

मज़दूरों की संख्या के आधार पर संहिताओं के लागू होने के लिए मनमानी सीमा के निर्धारण के कारण भारतीय मज़दूरों की एक बहुत बड़ी आबादी न्यूनतम मज़दूरी, नौकरी की सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा जिसमें स्वास्थ्यसेवा और सेवानिवृत्ति लाभ (रिटायरमेंट पर मिलने वाले लाभ), और कार्यस्थल अनुशासनात्मक नियमों से बाहर हो जाएंगे। निश्चित अवधि के रोजगार (फिक्सड टर्म कॉट्रैक्ट) को मान्यता, ठेका मज़दूरों की नौकरी सुरक्षा में कमी, कार्यस्थल सुरक्षा नियमन को हटाना, और निरीक्षण प्रणाली में घटोतरी, समान काम करने वाले मज़दूरों के बीच अन्यायसंगत भेदभाव पैदा करता है। संहिताएं नियोक्ताओं को उच्च स्तर की प्रतिरक्षा प्रदान करती हैं जबकि मज़दूरों की जवाबदेही को सख्त रखती हैं, जिससे कानून के समक्ष सकल असमानता पैदा होती है और प्रभावी रूप से असमानता को वैधता मिलती है।

2. अनुच्छेद 19(1)(c) का उल्लंघन: यूनियन बनाने या शामिल होने का अधिकार

औद्योगिक संबंध संहिता यूनियन पंजीकरण, बहुसंख्यक स्थिति, और हड़ताल के अधिकार पर अनुचित प्रतिबंध लगाती है। यह सीमित करके कि कौन मज़दूरों का प्रतिनिधित्व कर सकता है और अपनी श्रम शक्ति को वापस लेने के मज़दूरों के अधिकार के रूप में वैध हड़तालों के लिए लगभग असंभव परिस्थितियां बनाकर, सरकार संविधान द्वारा गारंटीकृत यूनियन बनाने की स्वतंत्रता का उल्लंघन करती है।

3. अनुच्छेद 21 और 23 का उल्लंघन: सम्मानित जीवन जीने का अधिकार और शोषण के विरुद्ध अधिकार

कार्यस्थल सुरक्षा प्रावधानों को कमजोर करना, 12 घंटे के कार्यदिवस को चुपके से वैध बनाना, रोजगार सुरक्षा से इनकार करना, सामाजिक सुरक्षा तंत्र को भंग करना और न्यूनतम मज़दूरी से कम दर पर फर्श मज़दूरी का निर्माण मज़दूरों के सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार के मूल को प्रभावित करता है। संहिताएं ऐसी परिस्थितियों की अनुमति देती हैं जो स्वास्थ्य, सुरक्षा और आजीविका को कमजोर करती हैं और गुलामी की परिस्थितियाँ उत्पन्न कर, मज़दूरों को बंधुआ मजदूरी की ओे लौटाती हैं।

4. संघवाद पर हमला (अनुच्छेद 246 और 254; सातवीं अनुसूची)

श्रम समवर्ती सूची का विषय है, अर्थात्, जहां केंद्र और राज्यों की सरकारों के बीच शक्तियां साझा की जाती हैं। फिर भी, संहिताएं केंद्र सरकार को नियम बनाने, मौजूदा राज्य कानूनों के अधिरोहण, और नियामक संरचनाओं को निर्देशित करने की व्यापक शक्तियां प्रदान करती हैं। राज्यों को केवल कार्यान्वयन एजेंसियों के सांचे में ढाल दिया गया है जिनके पास वस्तुतः कोई विधायी प्राधिकार नहीं है। यह भारत के ‘राज्यों के संघ’ विचार पर सीधा हमला है और राज्य और केंद्र सरकारों के बीच शक्ति के विभाजन का उल्लंघन है।

5. विधायी शक्ति का अत्यधिक प्रत्यायोजन

संहिताएं संसद द्वारा सुरक्षित मौजूदा अधिकारों को निरस्त करती हैं और उन्हें कार्यपालिका – विशेष रूप से केंद्र सरकार – की स्वेच्छा से तय करने के लिए प्रावधान स्थापित करती हैं। मज़दूरी के आधार, कार्य घंटे, सामाजिक सुरक्षा, निरीक्षण तंत्र, और छंटनी के लिए सीमा तय करने की शक्ति को संसदीय सुरक्षा से हटा दिया गया है और सरकार को सौंप दिया गया है। यह शक्तियों के पृथक्करण और इस सिद्धांत का उल्लंघन करता है कि आवश्यक विधायी कार्यों को प्रत्यायोजित नहीं किया जा सकता। ‘मूल संरचना सिद्धांत’ निजी संपत्ति के अधिकारों के बारे में नहीं है। यह मज़दूरों और उनके अधिकारों तक भी विस्तृत है।

लोकतंत्र पर गहराता संकट

कार्यपालिका शक्तियों का आह्वान करके इन संहिताओं को लागू करना, संसद में बहस को दबाना, राज्यों से परामर्श किए बिना इसे बढ़ावा देना, मज़दूर यूनियनों के विरोध की अवहेलना करना, और त्रिपक्षीय मशीनरी को पूरी तरह से त्यागना असंसदीय, असंवैधानिक, और मज़दूरों-विरोधी है। सरकार ने संविधान के प्रति तिरस्कार, लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति तिरस्कार, और उन मज़दूरों के प्रति तिरस्कार प्रदर्शित किया है जिन्होंने इस देश का निर्मिाण किया है और जो इसे जीवंत रखे हुए हैं।

यह श्रम संहिताएं कतई श्रम सुधार नहीं हैं। यह लगभग एक सदी के संघर्षों को छीनने की चाल है – ऐसे संघर्ष जिन्होंने मज़दूरों के अधिकारों को हमारे लोकतंत्र के ताने-बाने में संजोया है। इन संहिताओं को कार्यकारी आदेश के माध्यम से लागू करके, सरकार लोकतांत्रिक प्रतिरोध को दरकिनार करने और संविधान द्वारा सरकार पर लगाए गए सीमाओं को निषप्रभाव करने का प्रयास करती है।

न्यू ट्रेड यूनियन इनिशिएटिव संहिताओं को पूरी तरह से अस्वीकार करता है।

हम उस तरीके को भी अस्वीकार करते हैं जिससे इन क़ानूनों को थोपा गया है। हम मज़दूरों के अधिकारों और  संविधान की संघीय संरचना को ढाह कर नए कानून बनाने के सरकार के इस प्रयास को अस्वीकार करते हैं।

न्यू ट्रेड यूनियन इनिशिएटिव मुल्क के सभी मेहनतकश लोगों और उनके यूनियनों और सभी अन्य प्रगतिशील बलों से एक आवाज में उठने का आह्वान करता है और केंद्रीय यूनियनों की 26 नवंबर 2025 को देशव्यापी संघर्ष के आह्वान में शामिल होने का आह्वान करता है। इस संघर्ष की हुंकार से कोई भी कार्यस्थल, कोई भी शहर या गांव की चौपाल, मुल्क का कोई भी कोना अछूता ना रहे। यह संघर्ष की शुरुआत है, ऐसा संघर्ष जो तब तक नहीं रुकेगा जब तक चारों श्रम संहिताओं को निरस्त नहीं कर दिया जाता, ऐसा संघर्ष जो केवल एकजुट, लोकतांत्रिक और संघर्षशील मेहनतकश वर्ग की शक्ति प्राप्त कर सकती है।