संघर्ष संवाद
Sangharsh Samvad
.

वनाधिकार

मोदी सरकार की उपेक्षा के कारण 20 लाख आदिवासी परिवारों के सामने पैदा हुआ अस्तित्व का संकट

केन्द्र की उदासीनता से आदिवासियों के अस्तित्व पर खतरा-रनसिंह परमार केन्द्र की उपेक्षा के कारण आदिवासियों के आवासीय और आजीविका के अधिकार पर प्रश्न ग्वालियर। केन्द्र सरकार की उपेक्षा के कारण 20 लाख आदिवासी परिवारों के समक्ष आवास और आजीविका का खतरा पैदा हो गया है। उक्त बात एकता परिषद के अध्यक्ष रन सिंह परमार ने ग्वालियर में आयोजित भूमि अधिकार की…
और पढ़े...

सुप्रीम कोर्ट का फरमान : इक्‍कीस राज्‍यों के दस लाख आदिवासी खाली करें ज़मीन

सुप्रीम कोर्ट ने बीती 13 फरवरी को एक बेहद अहम फैसला सुनाते हुए 21 राज्‍यों को आदेश दिए हैं कि वे अनुसूचित जनजातियों…

वनाधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग को लेकर छत्तीसगढ़ के आदिवासी 23 अगस्त…

आदिवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय की भूल सुधार के रूप में बने वनाधिकार कानून का प्रत्यक्ष उल्लंघन अगर कहीं दिख…

बैतूल के आदिवासियों ने शुरु किया सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा बचाओ अभियान

मध्य प्रदेश में बीते 21 सालों से वन विभाग द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना की जा रही है। 12 दिसंबर 1996 भारत की सर्वोच्च अदालत ने सिविल याचिका क्रमांक 202/95 में वन और वन भूमि की व्याख्या एवं परिभाषा कर आदेश दिया था। इस आदेश के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय ने छोटे एवं बड़े झाड़ के जंगलों को वन भूमि के तौर पर परिभाषित किया था।…
और पढ़े...

वनाधिकार, भूमि एवं श्रम अधिकार के सवाल पर विशाल जनविरोध प्रदर्शन; 30 जून 2015

वनाधिकार, भूमि एवं श्रम अधिकार के सवाल पर विशाल जनविरोध प्रदर्शन 30 जून 2015 हाईडिल मैदान, राबर्ट्सगंज सोनभद्र-उ0प्र0 साथियोे! 31 मई 2015 को केन्द्र की एन.डी.ए सरकार ने देशभर में हो रहे भरपूर विरोध के बावज़ूद तीसरी बार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को फिर से ज़ारी कर दिया है। इससे पूर्व इस अध्यादेश को दिनांक 31 दिसम्बर 2014 को व 3 अप्रैल को भी जारी…
और पढ़े...