संघर्ष संवाद
Sangharsh Samvad

आखिर नगड़ी के दर्द को कौन समझेगा ?

झारखण्ड की राजधानी रांची से सटे कांके थानान्तर्गत एक आदिवासी बहुल गांव है जिसका नाम नगड़ी। इस गांव की 227 एकड़ जमीन राज्य सरकार ने बंदूक के बल पर छीनकर नेशनल लॉ यूनिवर्सिटि, आई.आई.आई.टी एवं आई.आई.एम. बनाने की तैयारी शुरू कर दी थी ।  सरकार ने सैंकड़ों पुलिस फोर्स को खेत में उतार कर चारदिवारी का काम प्ररंम्भ किया 9 जनवरी 2012 के बाद ग्रामीणों को अपने खेत में जाने पर रोक लगा दिया गया । कोई खेत में जा नहीं सकता है। पूरे 227 एकड़ जमीन में 144 धारा लगा दिया गया. खेत में गाय-बैल, मुर्गी-चेंगना को भी चरने के लिए जाने नहीं दिया गया था। नगड़ी के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन पर दयामनी बारला कि एक रिपोर्ट :-

 25 जुलाई 2012 बंदी के दौरान जो तोड़-फोड़ हुआ, खून बहा वहा, यह दुखद रहा। जो नहीं होना चाहिये था। हिंसा से किसी भी समस्य का हल नहीं निकलता है। नगड़ी का आंदोलन भी अहिंसा के रास्ते ही यहां तक पहूंचा है, जो अपने भीतर कई दर्द और सवालों को दबाये रखा है। 25 की घटनाओं को तो दुनिया के सामने रख ही दिया गया है। लेकिन नगड़ी के ग्रामीणों का क्या कसूर है? 7 जनवरी 2012 को बेकसूर 12 ग्रामीणों पर निर्माण कार्य में बाधा डालने का केस थोपा गया। 

इस केस में हर तीसरे दिन एसडीओ कोर्ट में हाजरी देना पड़ता था। 9 जनवरी 12 से सैंकड़ों पुलिस फोर्स खेत में उतार कर चहारदिवारी का काम प्ररंम्भ किया सरकार ने। 9 जनवरी 2012 के बाद ग्रामीणों को अपने खेत में उतरने पर रोक लगा दिया गया । कोई खेत में जा नहीं सकता है। पूरे 227 एकड़ जमीन में 144 धारा लगा दिया गया और पूरे खेत में सैंकड़ों पुलिस बल को तैनात कर दिया गया। खेत में गाय-बैल, मुर्गी-चेंगना को भी चरने के लिए जाने नहीं दिया जाता था। बाद में आंदोलन तेज होने के साथ ही बैल-बकरियों,  को खेत में चरने दिया जाने लगा। नदी के किनारे 100 एकड़ से अधिक जमीन में किसान गेहुं, चना, आलू, मटर, गोभी, आदि सब्जी लगा दिये थे-सबको पुलिस वाले बुलडोज कर दिये। 

सच क्या है? 
सरकार कहती है 1957-58 में इस जमीन का अधिग्रहण किया गया है। दूसरी तरफ ग्रामीण आज भी इस जमीन पर खेती कर रहे हैं, जमीन का जमाबंदी दे रहे हैं। सच क्या है इसकी तड़ताल करने के लिए मैंने भूमिं अर्जन विभाग में आर टी आई के तहत सूचनाएं मांगी-कि राजेंन्द्र कृर्षि बिश्वा विद्यालय के लिए कुल कितना एकड़ जमीन, किन किन किसानों का, खाता ना0, प्लोट ना0 और रकबा सहित जानकारी दें, साथ ही यदि किसानों का जमीन अधिग्रहण किया गया है-तो उस जमीन का कीमत किसानों को किस दर से भुगतान किया गया है-इसकी जानकारी मनी रिसिप्ट के साथ उपलब्ध करायें। इन सभी सवालों को उत्तर देते हुए भूमिं अर्जन विभाग ने 29 फरीवरी 2012 को लिखित उत्तर दिया, जिसमें लिखा हुआ हैं कि-1957-58 में जब जमीन अधिग्रहण किया गया उस समय 153 राईयत थे-इसमें से 128 राईयतों ने पैसा लेने से इंकार कर दिये, इसलिए वह राशि रांची कोषागार में जमा है। 
भू-अर्जन विभाग द्वारा 29 फरवरी को प्रप्त लिखित उत्तर के अनुसार 57-58 में बिरसा एग्रीकलचर यूनिर्वसिटी के लिये जमीन अधिग्रहण किया गया था। सही तथ्य क्या है-इसको समझने के लिए मैंने बिरसा एग्रीकलचर यूनिर्वसिटी में भी आर टी आई डाली। जिसमें निम्न जानकारी मांगी थी-
1-purbotar  राज्य सरकार (बिहार) द्वारा 1957-58 में राजेंन्द्र कृर्षि बिश्वबिद्यालय / बिरसा कृर्षि बिश्वबिद्यालय  कांके के नाम पर नगड़ी थाना सं0 53 में कितना एकड़ भूमिं अधिग्रहण किये है? 
2-किन किन रैयतों का जमीन कौन सा खाता नं0, प्लाट नां0 एवं कितना रकबा अधिग्रहण किया गया हे?
3-जिन रैयतों की जमीन बिश्वबिद्यालय अधिग्रहण किया गया है, उन्हें जमीन का कीमत कितना भुगतान किया गया, पावती रसीद सहित
4-रैयतों को जमीन को कीमत किस दर से भुगतान किया गया है, यदि जमीन को अधिग्रहण किया गया है तब उसका उपयोग आप किस उद्वे’य से अब तब करते आये हैं?
उपरोक्त तीन सवालों का जवाब निदेशालय, बीज एवं प्रक्षेत्र बिरसा कृर्षि विश्वाविद्यालय कांके रांची ने-दिया है कि-इसकी कोई जानकारी निदेशालय बीज एवं प्रक्षेत्र में नहीं है। चैथा सवाल का जवाब में इन्होंने कहा है-निदेशालय बीज एवं प्रक्षेत्र द्वारा किसी प्रकार का जमीन अधिग्रहण के फलस्वरूप भुगतान नहीं किया गया न ही उक्त जमीन का किसी प्रकार को उपयोग किया गया। 
इसके पहले का रिकोट को भी देखने की जरूरत है। 2008 में इसी जमीन होते हुए रिंग रोड़ बनाने की योजना आयी, अधीक्षण आभियानता पथ  निर्माण विभाग ने भू-अर्जन विभाग से नो ओबजेक्शान  सर्टिफिकेट मांगा, तब भू-अर्जन विभाग ने पथ निर्माण विभाग को जवाब दिया, उक्त जमीन बिरसा कृर्षि बिश्वबिद्यालय कांके के मालिकाना के अधिन है, इसलिए नो ओबजेकशान  सर्टिफिकेट बिरसा  कृर्षि  बिश्वबिद्यालय कांके से मांगा जाए। इसी निदेशानुसार पथ निर्माण विभाग ने बिरसा  कृर्षि विश्वाविद्यालय कांके को पत्र लिखा। 
पथ निर्माण विभाग के पत्र के जवाब में बिरसा  कृर्षि विश्वाविद्यालय कांके अपने पत्रांक एफ 39-369.08, दिनांक 17.2.08 को लिखा-जिन प्लोटों एवं रकबों का वर्णन आप के पत्र में है-के आलोक में यह सूचित करना है कि अभी तक भूमिं को विश्वाविद्यालय अधिग्रहित ही नहीं कर पायी है, इसलिए उक्त भूमिं का अनापति प्रमाण पत्र निर्गत करने का प्रशन  ही नहीं उठता है। 
भू- अर्जन विभाग के इस लिखित उत्तर प्रप्ती के बाद अपनी कृर्षि भूमिं की रक्षा के लिए 4 मार्च 12 से लगातार चिलचिलाती धूप में 150 दिनों तक नगड़ी चांवरा में सत्यग्रह-धरना में बैठे रहे।  इस दौरान हमारी माँ, बेटियां, बहुएं, बहनें, स्कूल के बच्चे, कॉलेज  के बच्चे, माँ -बाप सभी चिलचिलाती धूप में भी धरना स्थल में डटे रहे। गरमी के दिन में पेड़ की टहनियों -पत्तियों से बने छावनी में दिन-रात बिताये। बरसात भी पहुंच गया। बरसात में तिरपाल के छत के नीचे रात को भी वहीं खुला आशमान के नीचे, अपनी जमीन बचाने के लिये रात बिताये। तब किसी का दिल क्यों नहीं पिघला? मानवता के नाते इनके जिंदगी के दर्र्द को न तो किसी अखबार ने, न ही किसी व्यक्ति ने महसूस किया। 
इस दौरान लू लगने से हमारी तीन माँ -1-मुंदरी उरांव 2-दशमी केरकेटा 3-पोको तिर्की की मौत हो गयी। सवाल है-आखिर इनकी मौत के लिए कौन जिम्मेवार है, इनके हत्यारे कौन हैं? सत्यग्रह आंदोलन-धरना शुरू होने के बाद 6 मार्च से चहरदिवारी निमार्ण का कार्य 30 अप्रैल तक बंद रहा। लेकिन किसानों का सत्यग्रह धरना नगड़ी चांवरा में जारी रहा। इस बीच बार अशोशियेशन  ने निमार्ण कार्य को पुना प्ररंम्भ करने के लिए हाई कार्ट में पीआईएल दायर किया। इसका फैसला देते हुए 30 अप्रैल को हाई कोर्ट ने आदेश  दिया-48 घंण्टे के भीतर निमार्ण कार्य शुरू करो। बार अशिशियेशन ऩे कहा की- लो कॉलेज में पढने वाले लड़के-लड़कियों के लिए क्लास रूम की कमी हो रही है. इसलिए जल्दी निर्माण कार्य पूरा किया जाय.
2 मई को हजारों पुलिस फोर्स नगड़ी चांवर में फिर से उतारा गया। (कई बटालियन से) पांच थाना की पुलिस को भी उतारा गया। पांच मजिस्ट्रट को लगा दिया गया। एसडीओ श्री शेखर जमूआरजी सत्यग्रह धरना स्थल सौकड़ों पुलिस बल के साथ पहुंचे वे -ग्रामीणों से बोले, आप लोग यहां से हट जाओं काम ’शुरू करने जा रहे हैं-और नहीं हटोगे तो इसका अंजाम उठाने के लिए तैयार रहो। एक स्वर में धरना स्थल के साथियों ने जवाब दिया-आप को गोली चलाना है चला दिजीए-लेकिन अपने जमीन से हम नहीं हटेगें। 
ग्रामीण दिन-रात सत्यग्रह धरना स्थल में ही जमे रहे। माँ -बाप धरना हैं-छोटे स्कूली बच्चे भी साथ में खेत में ही रहते थें। यहीं से स्कूल जाते थे, स्कूल से वापस यहीं लौटते थे और स्कूल का होमवार्क, स्टटी यहीं करते थे। कोलेज में पढ़ने वाले 70-80 युवक-युवातियां भी काजेल जाना छोड़ कर धरना स्थल में जमे रहे, अपना जमीन बचाने के लिएं। इस बीच नगड़ी सत्यग्रह धरना में बैठे दर्जनों विद्यार्थीयों ने मैट्रीक की परिक्षा दी, इसमें अधिकांश  फेल हो गये, जो कभी स्कूल में एक बार भी फेल नहीं हुए थे। कई लड़के-लड़कियां एसएससी का कमपिटिशन लिखे, लेकिन फेल हो गये, कारण की जमीन बचाने के लिए धरना में बैठे रहे। 
हमारा सवाल है- बार अशोशियेशन लो कॉलेज में पढने वाले बिद्यार्थियों के लिए चिंतित है..की उनके लिए क्लास रूम नहो हो रहा है..लेकिन नगदी के किसानो के इन बच्चों की निंदगी का कोई कीमत नहीं है ? जो आज अपना जिंदगी उजड़ता देख, नगदी चंवरा में दिन रात सत्याग्रह-धरना में बैठ रहे हैं, school – कॉलेज छोड़ कर..इनके लिए कौन जिमेवार है ? क्या इन बच्चों को औरों   की तरह जीने का अधिकार नहीं है..?
  
दूसरी ओर पुलिस फोर्स लगाकर सरकार चहरदिवार का निमार्ण कार्य को आगे बढ़ाता रहा। धरना स्थल में बैठे ग्रामीण एक -एक ईंट से अपने खेत को घेरा बंदी कर कब्जा करते निरीह निगाहों से दिखते रहे। धरना स्थल में एक साथ खिजड़ी पका कर खाते थे। दोपहर को खाने के समय दिल को दहला देने वाली स्थितियों का भी सामना करना पड़ रहा था। थाली में भात, हाथ थाली के भात में है, और एक टक नजर अपने खेत में खड़ा हो रहा दिवार पर है, आंसू आंख से बहते हुए गाल में पानी के बुंद की तरह लुढ़क रहा है। कई बार टोकने पर भी कोई आवाज नहीं, न तो पलक ही झपक रहा है।
  
सत्यग्रह स्थल के नीचे चांवरा में किसानों का एक कुंआ है-वहीं से धरना स्थल के लिए पानी ले जाते थे। बाद में इस कुंआ को भी घेर लिया गया। ग्रामीणों ने अग्राह किया कि पानी लेने के लिए रास्ता छोड़ दिया जाए, लेकिन ठेकेदार के लोगों ने नहीं माना। पानी लाने गयी महिलाओं के साथ बसह हुआ-तब वहां फिर से पुलिस कांके थाना को बुला लिया गया। अब पानी के लिए दिक्क्त होने लगा। अब गांव से ही लोग पानी लेकर आ रहे थे। 
हम लोगों ने अपनी मांगों को लेकर लोकतत्रिक व्यवस्था में जनता की बात-समस्याओं को रखी और सुनी जाने वाली सभी मंचों पर ले कर गये। जनवरी 12 से जून 2012 तक चार बार महामहिम राज्यपाल के पास लिखित मांग के साथ गये। एक बार डीसी के पास, एक बार कमिश्नर  के पास गये। एक बार उप मूख्यमंत्री श्री सुदेश कुमार महतोजी, एक बार उप मुखिया मंत्री  श्री हेमंत सोरेन एवं गुरूजी श्री शिबू सोरने के पास गये। सभी अधिकारियों को अपनी मांग के साथ, आई आई एम और लाॅ कालेज बनाने के लिए कांके प्रखंड में उपलब्ध बंजर भूमिं को देखने -का भी सूझाव दिया गया। ग्रामीण लिखित देते रहे कि हम लोग लो  कालेज और आई आई एम का विरोध नहीं कर रहे हैं-लेकिन हमारी जीविका -कृर्षि भूमिं, जो हमारा जीविका का एक मत्र साधन है को उजाड़ कर नहीं। लेकिन न तो सरकार हमारी मांगों पर ध्यान देना चाहा, न ही सुझाव पर ।
न्यायपालिका भी हमारे साथ नहीं है
 लोकतंत्र में जनता की समस्याओं को सुनने का जो, सबसे महत्मपूर्ण जगह है-वह है न्यायालय। ग्रामीणों ने अपनी समस्या को लेकर मननीय उच्च न्यायालय भी गये। जब देश  के विकास में सहयोग करने की बात है-तो नगड़ी क्षेत्र से गुजरने वाली निमार्णधीन रिंग रोड़ के लिए जमीन की जरूरत थी तो ग्रामीणों ख़ुशी  से जमीन देने के लिए तैयार हो गये। रिंग रोड़ के लिए लिये जा रहे जमीन का मुआवजा दूसरे सभी गांवों के जमीन मालिकों को मिला, लेकिन नगड़ी के ग्रामीणों को जब सरकार नहीं दे रही है, तब ग्रामीणों ने रिंग रोड़ में जा रहे 13.47 एकड़ जमीन के लिए ग्रामीणों ने मुआवजा के लिए हाई कोर्ट में गये। कोर्ट ने रिंग रोड़ में जा रहे 13.47 एकड़ का फैसला नहीं सुनाया, बल्कि 227 एकड़ जमीन का फैसला देते हुए कहा-15 प्रतिशत व्याज राशि  बढ़ा कर ग्रामीणों को मुआवजा दिया जाए। यहां यह साफ होना चाहिए कि ग्रामीण जमीन का पैसा न तो 1957-58 में लिये आज भी लेना नहीं चाहते हैं। 
इस फैसला के बाद भी ग्रामीणों का अस्था उच्चतम न्यायालय के प्रति नहीं कम हुआ। दूसरी बार मई 2012 में ग्रामीण फिर अपनी बात कहने के लिए उच्चतम न्यायालय पहुंचे। लेकिन ग्रामीणों को यह पता नहीं था कि-जिस न्यायालय में न्याय मांगने की अर्जी कर रहे हैं-उस न्यायालय के मननीय न्याय मूर्ति -जज उस लाॅ यूनिर्वसिर्टी के चंश्लर -वीसी हैं, जिस लो  यूनिर्वसिटी के लिए पुलिस के बल पर नगड़ी के राईयतों का जमीन कब्जा किया जा रहा है। यही कारण है कि हाईकोर्ट से ग्रामीण को न्याय नहीं मिला। 16 मई को हाई कोर्ट ने किसानों के केस को खारिज कर दिया। 
हाई कोर्ट से जब ग्रामीणों को न्याय नहीं मिला, तब ग्रामीणों ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली। यहां पर मैं यह कहना चाहती हुं कि दो-दो बार हाई कोर्ट ने ग्रामीणों के खिलाफ फैसला दिया, फिर भी न्यायपालिका के प्रति ग्रामीणों का अस्था बना रहा। ग्रामीण सुप्रीम कोर्ट की ओर आशा  भरी नजरों से न्याय का इंतजार करते रहे। अततः 28 जून 2012 को नगड़ी का फाईल सुप्रीम कोर्ट के जज जीएल गोखले और रंजना देशई के डबल बेंच में दिन के 11 बजे पहुंची। मननीय जज ने यह कहते फाईल को एक किनारे फेंक दिये कि यह 50 साल पुराना केस है, इसको रिओपन क्यों कर रहे हो, इसको हम सुन नहीं सकते हैं। 
मथुरा समिति के सामने 16 जुलाई को ग्रामीणों ने अपनी बात रखी कि-हमारी कृर्षि भूमिं का कभी अधिग्रहण नहीं हुआ है, सरकार हमारी खेती की जमीन को जबरन छीन रही है, हम अपनी कृर्षि भूमिं  किसी भी कीमत पर नहीं देगें। अखबार में मैं पढ़ी थी-कि नगड़ी के केस को उचित मंच में ले जाना चाहिए था। मैं जनना चाहती हुं कि-उपरोक्त जगह जहां जहां हम लोग गये क्या इससे भी और कोई उचित मंच है इस लोकतंत्र में।
बरसात पहुंच गया। खेती करने के लिए किसान अपने खेतों में हल चलाने के लिए उतरे। तब भी किसानों को पुलिस बल बुला कर चह चलाने से रोकने की कोशीश  की गयी। पुलिस और ग्रामीणों के बीच बहस हुआ। आतंक में जी रहे किसान अपने खेतों में खेती करने नहीं उतर पा रहे हैंं। जब हल जोतने किसान खेतों में उतरते हैं-अखबारों में खबरें छपती है-ग्रामीणों ने आई आई एम की जमीन पर हल चला दिया, तो कभी अखबारों में छप रहा है  कि-ट्रिपल आई टी के जमीन पर किसानों ने हल चला दिया। किसान हैरान हैं-कि हमने तो अपना खेत में हल चलाया-लेकिन हम पर यह अरोप क्यों लगाया जा रहा है-कि हमने आई आई एम की जमीन पर हल चला दिया?
4 जुलाई के लाठी चार्ज में दर्जनों महिलाएं घायल हुई। कई बुजुर्ग महिलाओं का हाथ टुटा। जिनकी उम्र 45 से 65 साल तक है। दो महिला साथियों को घायल अवस्था में ही अरेस्ट किया गया। बंधनी टोप्पो( लगभग 45) और जामी( 55) को। 12 दिनों तक रिम्स में पुलिस कस्टटी में इलाज चलता रहा। थोड़ा ठीक होने पर दोनों को होटवार जेल में बंद कर दिया गया। दो पुरूष साथी को 4 जुलाई की रात को ही जेल भेज दिया गया। आप लोगों को यह भी बताना जरूरी है कि-बंधनी टोप्पो के पति एक दरोगा हैं और जामी का बेटा और बहु दोनों झारखंड पुलिस में हैं। इससे ज्यादा सादगी और इमानदारी का, और कौन सा मिसाल नगड़ी के ग्रामीण दे सकते हैं? 
कानून के संरक्षक ही कानून की धजियां उड़ा रहे हैं
नगड़ी के जिस खेती की जमीन को सरकार अधिग्रहित मानती है, वह गलत तरीके से अधिग्रहण किया गया है। तत्कालीन राजेंन्द्र एग्रीकलचर यूनीर्वसीटी के लिए जिस 227 एकड़ जमीन को 1957-58 में सरकार भूमिं अधिग्रहण कानून 1894 के धारा 4, धारा 5, धारा 6, धारा 7 और 9 के तहत अधिग्रहित बता रही है वह गैर कनूनी तरीके से अधिग्रहण किया गया है। धारा 4 में किसी अरजेंन्सी केस के किसी भूमिं अधिग्रहण करने का प्रावधान है। यदि एग्रीकलचर यूनिर्वसिटी के लिए जमीन अधिग्रहण करना अरजेंन्सी था-तब 50 साल तक उस जमीन अधिग्रहण क्यों नहीं किया गया। सवाल दूसरा यह है-कनून कहता है-जिस जमीन को जिस परपस से आप अधिग्रहण कर रहे हैं-उस जमीन का जिस परपस से लिया गया है, उसके लिए यदि 10 साल तक उपयोग नहीं किया गया-तब वह जमीन स्वतः मूल राईत को वापस हो जाएगा।
कानून की बात करें तो यह-भारतीय संविधान में पांचवी अनुसूचि में आता है, इस इलाके के लिए कानूनी प्रावधान है कि-जिस भी योजना के लिए जमीन अधिग्रहण किया जाएगा-संबंधित ग्राम सभा या ग्रामीणों से सहमति लेना जरूरी है। इस संबंध में धारा 5 के तहत ग्रामीणों की सहमति के लिए आम सभा बुलायी जाती है। नगड़ी के जमीन अधिग्रहण के सवाल को लेकर 1957-58 में भी आप सभा के लिए सरकारी अधिकारी नगड़ी आये थे। लेकिन ग्रामीणों ने हम अपना जमीन किसी भी कीमत में नहीं देगें की घोषणा करते हुए, आम सभा के लिए आए सरकारी अधिकारियों को गांव से खदेड़ दिये थे। उस समय जमीन अधिग्रहण के खिलाफ कई सालों तक आंदोलन चला। यही कारण है कि-सरकार जमीन का मुआवजा देने की कोशीश  की थी-लेकिन ग्रामीणों ने पैसा लेने से इंकार कर दिया। जिस पैसा को सरकार रांची टेजरी में जमा है कहती है। 
9 जून को 2012 को ग्रामीणों ने बिरसा शहादत दिवस के दिन राज्यपाल से जवाब मांगने के लिए कि-हमारी जमीन, हमारी सहमति के बिना क्यों कब्जा किया जा रहा है? के सवाल के साथ राजभवन का घेराव किये। अपनी लिखित मांग इस बार भी रैयतों ने महामहिम को सौंपे। मांग पत्र सौपते हुए महिला साथी -नंदी कचाप जी ने ग्रमीणों की पीड़ा को रखी-बोली, महामहिम आप के पास पहले ही हमलोग अपनी जमीन बचाने के लिए आप के पास आ कर अपनी दुख का बयान कर चुके हैं। महामहिम -अब हम लोग आप के पास और नहीं आएगें, पानी बरसेगा-हम लोग खेत जोतेगें, खेती करेगें, आप के पास पुलिस है, पुलिस गोली चालाएगी, हम लोग खेत में ही मर जाना चाहते हैं-लेकिन भूमिंहीन हो कर जीना नहीं चाहते हैं।
इसके उतर में महामहिम ऩे कहा- आप लोगों की समस्या को लेकर मैंने दो बार सरकार को पात्र लिखा, लेकिन अब तक सरकार ऩे कोई रिपोर्ट नहीं दिया. हम लोगों ऩे राजपाल को बोले- महामहिम, सरकार रिपोर्ट नहीं देगी,,कारण की सरकार ही हाई कोर्ट को भी गुमराह किया है..की जमीन का अधिग्रहण हो चूका है.
11 जून को ठेकेदार के लोग जमीन का चहरदिवारी बढ़ाने के लिए दूसरी तरफ खोदने लगे। इसी बीच 5-6 लोगों ने उन लोगों से अग्राह किये-अभी केस कोर्ट में है इसलिए इधर अभी काम आगे मत बढ़ाइये। इस पर ग्रामीणों सौंकड़ों ग्रमाीणों पर मार-पीट, काम में बाधा डालने का आरोप लगा कर केस किया गया। यहां समझने की जरूरत है-कि अपने ही खेत की बात करने  वाले करने वाले किसानों पर अभी तक 4 बार केस किया जा चूका है। ये कैसा लोकतंत्र है? और आखिर न्यायपालिका किसके लिए है? सिर्फ सरकार के लिए, अमीरों के लिए? आखिर आदिवासी-मूलवासी किसानों के न्याय के लिए कहीं कोई जगह है?
मैं आप लोगों को याद दिलाना चाहती हु  की आप के घर में यदि एक चूहा घुस जाता है, आप के कमरे में वह घुमने लगता है-तब आप उसको देखकर असुरक्षित महसूस करने लगते हैं। और आप उसे कमरा बंद  करके उसे जान से मारने की कोशीश करते हैं। जब आप उसे से मारते हैं-जब तक उनके देह में ताकत होता है-वह अपनी बचाव में आप पर भी झपटने की कोशीश  करता है। दांत मारने की कोशीश  करता है। 
4 जुलाई के लाठी चार्ज के बाद 13 ग्रामीणों पर केस किया गया। इसमें प्रशासन ने धारा 307 भी लगाया गया है। एक दूसरा केस वहां निमार्ण कार्य कर रहे पटना के ठेकेदार ने सरकारी काम में बाधा डालने का आरोप लगा कर केस किया इसके आधार पर धारा 353 भी थोपा गया है। आज चार किसान होटवार जेल से बंद हैं। 
सरकार द्वारा जबरन जमीन कब्जा को रोकने की मांग को लेकर 6 जुलाई को कोर कमेटी के सदस्य, नगड़ीवासी, सहयोग संगठन के लोग मिल कर शिबू  सोरेन के पास मिलने के लिए गये उनके आवास में। हम लोगों ने पूरी बात उनके सामने रखे। गुरूजी बोले-आप लोगों का जमीन लूटा जा रहा है, आप लोग लड़ रहे हो, चोट भी लगी है, केस हुआ है जेल भी जाओगे। जेल जाओगे -तो हम तुम लोगों के साथ रहुंगा। 
मैं आप से कहना चाहती हुं हम लोग अपनी कृर्षि भूमिं की रक्षा के लिए 150 दिन तक अपने ही खेत में सत्यग्रह आंदोलन-धरना में बैठे रहे। लेकिन हम पर धारा 307 और 353 जैसा संगीन अरोप लगा कर हम ग्रामीणों को अपराधी करार दिया जा रहा है। नगड़ी के ग्रामीणों का जमीन वापसी के समर्थन में 25 जुलाई 2012 को झारखंड बंद का अहवान किया गया था। 24 जुलाई की शाम  को कई समर्थक संगठनों द्वारा रांची के अर्बट एक्का चैक में मशाल जुलूस निकाला गया। 25 जुलाई की सुबह 8 बजे से ही बंद समर्थक रोड़ में उतरे। नगड़ी के ग्रमीण भी बंद के सर्मथन में रोड़ में उतरे। बंद के दौरान शहर के विभिन्न इलाकों में छिट पुट तोड़-फोड़ की घटनाएं घटी।
25 को बंदी के दौरान हुए तमाम घटनाओं के लिए हम लोगों को जिम्मेवार ठहराया गया। बंद का असर गुमला जिला, रामगढ जिला, धनबाद, बोकारो, गिरिडीह और रांची में रहा। प्रशासन ने माले के जनार्दन प्रसाद, बहादुर उरांव, गुनी उरांव, ग्लेडशन, मैं सहित तीन सौ लोगों पर कोतवाली थाना में एफ आई आर दर्ज हुआ। प्रताप, ग्लेडशन और मेंरे उपर लालपुर थाना भी केस दर्ज हुआ। मेरे उपर लोअर बाजार थाना में दो केस दर्ज किया गया। पुलिस 28 जुलाई को गिफितार करने के लिए भी आयी, लेकिन तब मैं नगड़ी में ही थी। इस तरह से सरकार का राज्य प्रयोजित दमन नगड़ी को ले कर चल रहा है।
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