झारखण्ड के 12 साल: क्या खोया, क्या पाया
आज 15 नवंबर 2012 को अलग झारखण्ड राज्य के गठन को 12 साल पूरे हो जायेंगे। इस मौक़े पर आज रांची के मोरबादी मैदान में सरकारी उत्सव मनाया जायेगा। इसमें अब तक हुए तथाकथित विकास का ढोल पिटेगा जो ज़ाहिर है कि झूठ और मक्कारी से मढ़ा हुआ होगा। इसकी थाप यह एलान करने की गरज़ से होगी कि होशियार-ख़बरदार, अभी और अंधेरा छायेगा, कि हक़ और इंसाफ़ की आवाज़ को लाठी-गोली-जेल मिलेगी, कि सरकार बहादुर विकास के देवताओं की आरती उतारने को उतावली है, कि इसके लिए उसे आदिवासियों और मूलवासियों के दुख और ग़ुस्से की परवाह नहीं। दूसरी ओर उसी मैदान के एक कोने में विस्थापन और राज्य दमन के ख़िलाफ़ विभिन्न संगठनों और समुदायों की साझा हुंकार भी गूंजेगी कि बस अब और नहीं सहा जायेगा, कि विकास नाम के पगलाये अंधड़ को थमना ही होगा, कि झारखण्ड की जनता आख़िरी दम तक लड़ने को तैयार है।
विरोध - प्रतिरोध
बढ़ते दमन और दरिद्रता के 12 साल
-ग्लैडसन डुंगडुंग
कुछ का विकास, बाकी का सत्यानाश
-स्टेन स्वामी
12 साल के सफर में टूटे सपने
-बरखा लकड़ा
-ग्लैडसन डुंगडुंग
कुछ का विकास, बाकी का सत्यानाश
-स्टेन स्वामी
12 साल के सफर में टूटे सपने
-बरखा लकड़ा
अब तक राज्य सरकार ने देशी-विदेशी कंपनियों के साथ कुल 107 एमओयू किये। लेकिन यह तीखे जन विरोध का नतीज़ा है कि छोटे-मोटे उद्योगों को छोड़ दें तो कोई बड़ी कंपनी उसे अमली जामा पहनाने में कामयाब नहीं हो सकी। आख़िर उद्योग हवा में तो लगाये नहीं जा सकते। लोगों ने ताल ठोंक कर कहा कि वे विकास उर्फ़ उद्योगों के नाम पर अपनी एक इंच ज़मीन भी क़ुर्बान नहीं होने देंगे। याद रहे कि एक साल पहले इस्पात के बादशाह आर्सेलर मित्तल को जनता के इसी इस्पाती तेवरों ने झारखंड की धरती से अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर उल्टे पांव भाग जाने को मजबूर कर दिया था।
बहरहाल, इसी आइने में पेश है झारखण्ड में जन संघर्षों के मोर्चे की अगली क़तार में शामिल तीन जुझारू साथियों की महत्वपूर्ण टिप्पणियां;