खतरनाक विकिरण के साये में उत्तराखंड

45 साल पहले एक गोपनीय अभियान की विफलता के बाद गायब हुई परमाणु ईंधन सामग्री के खतरों को लोग भुला चुके हैं। सरकार और सत्ता प्रतिष्ठान इस बारे में कोई बात करने को तैयार नहीं हैं। पिछले महीने अंग्रेजी की एक प्रतिष्ठित पत्रिका ‘कारवान’ में विनोद के. जोस की एक रिपोर्ट ने इस रवैये पर सवाल खड़े किये हैं। यह रिपोर्ट उन लोगों को चौंका देने वाली है जो इस पुरानी घटना के बारे में कुछ नहीं जानते। रिपोर्ट में जो ब्यौरे दिये गए हैं, उन्हें संक्षेप में बयान करने पर भी इस बात को समझना कठिन नहीं होना चाहिए कि नन्दादेवी हिमनद क्षेत्र से लेकर गंगा के प्रवाह के मार्ग में भारी संख्या में रहने वाली आबादी कभी अचानक ही परमाणु विकिरण के दुष्प्रभावों की चपेट में आ सकती है। कारण स्पष्ट है, क्योंकि इस खतरे के स्रोत को ढूँढ कर समाधान निकालने के प्रयास बहुत पहले छोड़ दिये गए हैं।
इस खतरे की नींव तब पड़ी, जब 1965 में भारत और अमेरिका के एक संयुक्त पर्वतारोहण दल को अपना अभियान को मौसम की चुनौतियों के कारण अधूरा छोड़ना पड़ा। दरअसल यह ऐसा अभियान था, जिसमें देश के जाने-माने पर्वतारोहियों को अमेरिकी खुफिया एजेंसी सी.आई.ए. और भारत के गुप्तचर ब्यूरो ने मिलकर एक खास मकसद हासिल करने के लिए इस्तेमाल किया था। मकसद था, हिमालय की ऊँची चोटी पर ऐसे उपकरण स्थापित किये जाएँ जिनसे चीन के परमाणु परीक्षणों और ऐसी अन्य गतिविधियों के बारे में अमेरिका को समय से जानकारी मिल जाए। इन निगरानी उपकरणों के संचालन के लिए परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल करने की योजना थी। परमाणु ऊर्जा पैदा करने के लिए आवश्यक सामग्री के रूप में प्लूटोनियम और वांछित उपकरणों को पर्वतारोहियों की मदद से नन्दादेवी के शिखर पर पहुँचाया जाना था। इस कार्ययोजना को सी.आई.ए. ने इस तरीके से लागू किया कि किसी भी पर्वतारोही को अभियान के पीछे छिपे इरादों की भनक तक नहीं लगी।



पिछले साल क्षेत्रीय सांसद सतपाल महाराज ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर 45 साल पुरानी इस घटना की तरफ ध्यान खींच कर आवश्यक कदम उठाने की माँग की। परन्तु कुछ भी नहीं हुआ। स्थिति यह है कि परमाणु विकिरण की निगरानी भी नहीं हो रही है। लापता हुए पाँच किलोग्राम प्लूटोनियम व अन्य उपकरणों का इतने साल बाद भी पता नहीं लगा है। अब जबकि तकनीकी क्षमताओं और संसाधनों का बहुत विकास हो चुका है, लुप्त सामग्री की खोज का कोई प्रयास करने की जरूरत भी अनुभव नहीं की जा रही है। जबकि आज की परिस्थितियों में एक नया खोज अभियान चलाया जा सकता है, भले ही यह खर्चीला हो। परन्तु सरकारें आसानी से जागती नहीं हैं। सरकारी निद्रा के चलते नन्दादेवी से नीचे, उत्तराखंड के लोग अज्ञात खतरे से मुक्त नहीं हैं।
(साभार: नैनीताल समाचार)
(साभार: नैनीताल समाचार)