.
राज्यवार रिपोर्टें
भारतमाला-एक्सप्रेस भूमि अधिग्रहण : “जब तक नई बाज़ार दर से मुआवज़ा नहीं, तब तक नहीं देंगे ज़मीन”
बिहार के कैमूर सहित कई ज़िलों में अपनी ज़मीन के उचित मुआवज़े की मांग को लेकर किसान महीनों से आंदोलनरत हैं और इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं पूर्व कृषि मंत्री और राजद विधायक सुधाकर सिंह। पढ़िए यह एक्सक्लूसिव इंटरव्यू
और पढ़े...
हरियाणा : बेलसोनिका यूनियन की छंटनी के खिलाफ सामूहिक भूख हड़ताल, आंदोलन तेज करने…
हरियाणा के गुरुग्राम में दिनांक 26 मार्च 2023 को बेलसोनिका यूनियन ने आठ घंटे की सामूहिक भूख हड़ताल की। मजदूर विरोधी…
हरियाणा : बेलसोनिका प्रबंधन की तानाशाही के खिलाफ बेलसोनिका मजदूर यूनियन का संघर्ष…
हरियाणा, गुड़गांव स्थित बेलसोनिका ऑटो कंपनी लगभग पिछले दो सालों से कंपनी के अंदर फर्जी दस्तावेजों के नाम पर स्थाई…
गांव तक पहुंचा, कचरे का कहर
कहा जाता है कि शहरी लोग कचरे का सर्वाधिक विसर्जन करते हैं, लेकिन अब यह व्याधि गांवों तक भी पहुंच गई है। प्रस्तुत है, इसी विषय पर प्रकाश डालता कुलभूषण उपमन्यु का यह लेख;
भारतवर्ष में प्रतिदिन 28 करोड़ टन ठोस कचरा पैदा हो रहा है जिसमें से 10.95 करोड़ टन ग्रामीण क्षेत्रों में हो रहा है। ग्रामीण भारत में तेजी से बदलती जीवन-शैली के चलते शहरी सुविधाएँ…
और पढ़े...
निर्यात हेतु ‘जीएम’ बासमती नहीं, देशवासियों के लिए ‘जीएम’ सरसों क्यों?
खेती में अनेक सरकारी हस्तक्षेपों की तरह ‘जीन-संवर्धित’ बीजों को लाने के पीछे भी उत्पादन बढ़ाने का बहाना किया जा रहा…
बांध तो नहीं रुका, लेकिन क्या आंदोलन भी असफल रहा?
करीब चार दशकों के लंबे अनुभव में ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ को अपनी सफलता-असफलता के सवालों का सामना करते रहना पड़ा है। एक…
मध्य प्रदेश : ‘पेसा कानून’ के बरक्स बसनिया बांध
आज के विकास की मारामार में सरकारें और कंपनियां उन कानूनों तक को अनदेखा कर रही हैं जिन्हें बाकायदा संसद में पारित किया गया है। इन कानूनों के मैदानी अमल के लिए बनाए जाने वाले नियमों में, मूल कानून की भावना को तोड़-मरोड़कर राज्य सरकारें उन्हें अपनी तरफ कर लेती हैं। प्रस्तुत है, मध्यप्रदेश के मंडला जिले के बसनिया बांध में की गई इसी तरह की गफलत को…
और पढ़े...
जोशीमठ त्रासदी : अगली पीढ़ी के वृक्ष
अपने रहन-सहन और बसाहट के लिए समाज पर्यावरण में हस्तक्षेप करता है, कई बार इसके नतीजे दुखद भी होते हैं, लेकिन आमतौर…
पेसा कानून : 26 वर्षों से क्रियान्वयन का इंतजार करता आदिवासी स्व-शासन का कानून
-डॉ सुनीलम
24 दिसंबर 2022 को पेसा कानून लागू हुए 26 वर्ष पूरे हो जाएंगे। भारत की संसद में 15 दिसंबर 1996 को पंचायत…
भोपाल गैस त्रासदी – जख्म अभी भरे नहीं हैं !
‘भोपाल गैस त्रासदी’ के 38 वें साल में, उसके प्रति सरकारों, सेठों और समाज की बेशर्म अनदेखी के अलावा हमें और क्या दिखाई देता है? 1984 की तीन दिसंबर के बाद पैदा हुई पीढ़ी इसे लेकर क्या सोचती है? क्या उसे अपनी पिछली पीढ़ी के कारनामों पर कोई कोफ्त नहीं होती? प्रस्तुत है, इन्हीं सवालों को उजागर करता युवा अस्मा खान का यह लेख;
पुराने शहर की तरफ कभी यूँ…
और पढ़े...