संघर्ष संवाद
Sangharsh Samvad

कुछ का विकास, बाकी का सत्यानाश

अलग राज्य के तौर पर झारखण्ड के पिछले 12 सालों पर नजर डालते हुए सवाल उठता है कि इसका फल किसकी झोली में गया और कौन उससे वंचित हो गया या वंचित कर दिया गया? सीधे कहें तो छोटा सा हिस्सा वह है जिसने पाया जबकि बड़े हिस्से ने केवल खोया- अपना बहुत कुछ। पेश है स्टेन स्वामी की रिपोर्ट;

पहले उनके बारे में जिन्हें अलग झारखण्ड राज्य बनने से बहुत कुछ मिला। इनमें सबसे पहले उद्योगपति हैं। अब तक सरकार देशी-विदेशी कंपनियों से 107 एमओयू कर चुकी है। दावा है कि इसमें कोई एक लाख करोड़ रूपयों का निवेश होगा। इसके लिए कितनी जमीन चाहिए- एक लाख 60 हजार हेक्टेयर। राज्य सरकार कंपनियों को इसकी व्यवस्था हो जाने का भरोसा दे चुकी है। जाहिर है कि यह भारतीय संविधान के उन प्रावधानों का उल्लंघन करके किया जायेगा जो आदिवासियों के हित-अधिकारों की सुरक्षा के लिए बनाये गये हैं।


उद्योगपतियों के बाद खदान मालिकों का नंबर आता है। यहां 17 कोल ब्लाक का आबंटन हुआ। पता चला कि इसमें भारी गड़बड़ी हुई है। जिन पर इसके दाग लगे, उनमें खुद मुख्यमंत्री तक शामिल हैं। उन्होंने अपने ही निर्वाचन क्षेत्र में इसके लिए केंद्र से सिफारिश की थी।

इसके बाद राजनेताओं का नंबर है। भ्रष्टाचार दीमक की तरह सरकारी विभागों में चिपक गया है और फिलहाल उसका इलाज संभव नहीं दिखता। इसके पीछे राजनेताओं का ही हाथ है। भ्रष्टाचार के एक से बढ़ कर एक किस्से खुलते रहते हैं। जांच के आदेश होते हैं लेकिन उसका नतीजा क्या निकला, यह पता नहीं चल पाता। उसे दबा दिया जाता है या फिर जांच ही ठंडे बस्ते में पहुंचा दी जाती है। कार्रवाई होती है तो मामूली से मामलों पर ही। बड़ी मछलियां सुरक्षित बची रहती हैं, उन पर कोई आंच नहीं आ पाती। यहां तो ऊपर से नीचे तक गड़बड़ लोगों का दबदबा है। कौन किसकी पोल खोले? स्थिति यह है कि तुम हमें बचाओ, हम तुम्हें बचायें और दोनों आराम से बेधड़क लूटें।

लूटनेवालों में जाहिर है कि नौकरशाही भी शामिल है। सच तो यह कि राजकाज उन्हीं के भरोसे है- नौकरशाही इतनी ताकतवर है। सरकार के कल्याणकारी कार्यक्रमों को लेकर तय हो गया है कि उसे बस नाम के वास्ते चलाया जाना है- चाहे वह केंद्र सरकार का मनरेगा कार्यक्रम ही क्यों न हो। सभी जन हितकारी कार्यक्रम बस अधूरे और लचर हैं।

मुठ्ठी भर संख्यावाला उच्च वर्ग तो हमेशा से मौज में रहा है। बड़ी संख्यावाला शहरी मध्य वर्ग भी पीछे नहीं है। चाहे वह सरकारी क्षेत्र में हो या निजी क्षेत्र में- उसके वेतन और भत्तों में लगातार बढ़त हुई है। तेजी से धनाड्य हो रहा यह वर्ग ही झारखण्ड में उपभोक्तावाद का सबसे बड़ा वाहक और प्रचारक है। उसे चिंता नहीं कि बाकी समाज का क्या हालचाल है? उसे बस अपनी चिता है, राज्य के अधिसंख्य लोगों की नहीं। उसकी जेब में जरूरत से कहीं ज्यादा पैसा है और उसका बेशर्म प्रदर्शन है। इसी दीवाली में केवल रांची शहर में पटाखों से लेकर बर्तन, कपड़े, जेवर आदि में 12 सौ करोड़ का व्यापार हुआ। यह कहां से आया? इसकी जांच कौन करे और कैसे?

पानेवालों में गुंडे और बिचौलिये भी हैं। उद्योगपतियों को उद्योग खड़ा करने के लिए जमीन चाहिए और लोग अपनी जमीन देने को तैयार नहीं। जब बहलाने-फुसलाने से लोग नहीं मानते तो गुंडे काम पर लगा दिये जाते हैं। उधर बिचौलिये समझाने में लगे रहते हैं कि भला इसी में है कि अपनी जमीन छोड़ दो वरना जो मिल रहा है, उसे भी खो दोगे। जमीन तो आखिरकार देनी ही होगी। गुंडे और बिचौलिये उद्योगपतियों की सेवा में हैं। याद रहे कि इनमें अधिकतर झारखण्ड से बाहर के लोग हैं- मुख्यत: बिहार और उत्तर प्रदेश के। उनका काम है कि जो बोले- उसे पीटो, लूटो या जान से मार दो। लेकिन उनका कुछ नहीं बिगड़ता। उन्हें पुलिस-प्रशासन का पूरा संरक्षण जो हासिल है। इसलिए कि सरकार भी तो उद्योगपतियों के साथ खड़ी है। सुरक्षा बल दो कदम और आगे हैं। अक्सर खबरें आती हैं कि नक्सलियों की तलाश में निकले जवानों ने बलात्कार किया, घर और फसलों को आग के हवाले किया। यह आयेदिन का किस्सा बनता जा रहा है। अलग राज्य बनने के बाद यह नयी परिघटना है।  

अब खोनेवालों की चर्चा। पिछले 12 सालों में सबसे पहले और सबसे ज्यादा झारखण्ड की आदिवासी जनता ने खोया। वह जल, जंगल, जमीन की असली मालिक है और उससे इसे छीन लेने के प्रयास लगातार जारी हैं। इसी कड़ी में राज्य सरकार की यह खतरनाक चाल भी है कि आदिवासियों की संख्या घटा कर बतायी जाये ताकि उसकी जमीन हथियाओ मुहिम को आसान बनाया जा सके। खेती की जमीन को गैर खेतिहर जमीन बताया जा रहा है और जन हित में उसके अधिग्रहण की तैयारी है। इसका तगड़ा विरोध हो रहा है। लोग इस जुर्म में गिरफ्तार किये जा रहे हैं, जेल भेजे जा रहे हैं। नगड़ी का मामला एकदम ताजा है। दयामनी बारला पर एक के बाद एक फर्जी मामले बनाये गये और उन्हें जेल पहुंचा दिया गया। इसके खिलाफ हम सब आवाज उठा रहे हैं। झारखण्ड से बाहर भी इसका विरोध हो रहा है।

झारखण्ड की जनता ने अपने पूरे इतिहास में इतनी परेशानियों का सामना नहीं किया, जितना उसे इन 12 सालों में लगातार करना पड़ा और जिसका सिलसिला लगातार जारी है। विरोध करनेवालों को नक्सली बता दिया जाता है। लोगों के सामने उसकी गलत और मनगढ़ंत तसवीर पेश की जाती है और इस तरह ऐसा माहौल पैदा करने की कोशिश की जाती है कि बेगुनाहों के खिलाफ की जानेवाली कार्रवाइयों को सही ठहराया जा सके। ऐसा नहीं कि केवल आदिवासी ही परेशान हैं। राज्य में दलित कुल आबादी में 10 प्रतिशत हैं। वे हमेशा से लगभग भूमिहीन रहे हैं। महाराष्ट्र की तरह यहां उनका कोई सशक्त संगठन नहीं जो उनकी आवाज बुलंद कर सके। यहां तो उनका अस्तित्व ही जैसे गायब है। कुछ के पास जमीन का छोटा टुकड़ा रहा है जो उनके जीवन का आधार रहा है। उसे भी छीना जा रहा है। पेट भरने के लिए उन्हें पलायन करने को बाध्य होना पड़ रहा है। बड़े शहरों में वे अंसगठित क्षेत्र के मजदूर हैं और जहां उनकी सुननेवाला कोई नहीं, उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं।

कहना होगा कि 12 सालों में सबसे अधिक महिलाओं ने खोया। परंपरागत रूप से आदिवासी समाज में महिलाओं का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। लेकिन पिछले 12 सालों की हलचलों से यह बहुत हिला है। यह चिंताजनक बात है। मोटे अनुमान के अनुसार राज्य की कोई दो लाख महिलाओं ने बड़े शहरों में पलायन किया। इनमें अधिकतर कम उम्र की हैं, आदिवासी समाज के अलावा दलित समाज की भी हैं। वहां वे घरेलू नौकरानी के बतौर काम कर रही हैं। इनमें से ज्यादातर शोषण और अत्याचार झेलती हैं। कुछ अभागी लड़कियां वेश्यावृत्ति के लिए तस्करी की भेंट भी चढ़ जाती हैं और गायब हो जाती हैं। नयी दिल्ली में कुछ दोस्तों की मदद से कुछ हजार महिलाओं को सुरक्षा और उचित वेतन दिलाने का काम हो सका। लेकिन यह नाकाफी है। असली समाधान तो केंद्र और राज्य की सरकार के ही हाथ में है।

खोनेवालों में शहरी गरीब भी हैं। उनकी संख्या लगातार बढ़ी है। इसलिए कि उन्हें काम की तलाश में गांव छोड़ शहर आने को मजबूर होना पड़ा। वे स्लम में रहते हैं और कुलीनों की नजर में शहर को गंदा करने के लिए जिम्मेदार हैं। स्लम का होना शहरों की खूबसूरती को खतम करता है। इसलिए उन्हें उजाड़ देने की कार्रवाइयां होती रहती हैं। कोई तीन साल पहले अकेले रांची में ही ऐसी तीन-चार बड़ी झोंपड़पट्टियों को बुलडोजरों से रौंदा गया। इस पर खूब हंगामा मचा। आखिरकार राज्य सरकार को पुनर्वास नीति बनाये जाने का वायदा करना पड़ा। दो साल गुजर गये लेकिन उस नीति का कहीं कोई अता-पता नहीं।

उधर, गांवों में कोई दो तिहाई महिलाएं खून की कमी का शिकार हैं और गांवों के लगभग आधे बच्चे कुपोषण के घेरे में हैं। यह दुख और शर्म की बात है। तो अलग राज्य के रूप में झारखण्ड की 12वीं सालगिरह पर खुशी में ताली पीटने की कोई वजह नजर नहीं आती। जो इसे मना रहे हैं, उन्होंने तो झारखण्ड को लूटने का काम किया है। झारखण्ड की आम जनता के लिए तो 15 नवंबर का कार्यक्रम केवल सरकारी तमाशा है।

(सतन स्वामी से हुई बातचीत के आधार पर आदियोग की पेशकश)

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