इसे सूखा नहीं, सामूहिक नरसंहार कहिए !

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झांसी के यार्ड में दो हफ्ते से खड़ी पानी की ट्रेन विकास के उसी भ्रामक मॉडल का परिणाम है जिसके नक्शे कदम पर कचनौदा में 425 करोड़ की लागत से उत्तर प्रदेश का पहला ऑनलाइन बांध बनाया गया है। ललितपुर से करीब चालीस किलोमीटर दूर सजनाम नदी के ऊपर यूपी का पहला ऑनलाइन प्रबंधित बांध बना है कचनौंदा बांध। इसका लोकार्पण हुए चार साल हो गया हालांकि पिछले साल अक्टूबर में पहली बार आए पानी के बाद से नदी अब तक सूखी है। यह बांध भुखमरी के साम्राज्य के बीच अश्लीलता का एक ऐसा हरा-भरा टापू है, जहां हर रोज़ शाम को बाइक सवार प्रेमी जोड़े और संपन्न परिवार पिकनिक मनाने आते हैं। बांध के ऑपरेटर लखनऊ निवासी संजय यादव को इस बात का दुख है कि 65,000 रुपये प्रति ट्रक के हिसाब से गुड़गांव से मंगाई गई इम्पोर्टेड घास पानी के अभाव में पीली पड़ रही है और उसे गायें चर रही हैं। वे कहते हैं, ”करोड़ों रुपये की घास यहां लगाई गई है। ये जो लाइट के पोल आप देख रहे हैं, इनके एक बल्ब की कीमत 18000 रुपये है।”
विडंबना देखिए कि जो पानी वाली ट्रेन लोगों के लिए पानी लेकर झांसी पहुंची थी, उसे उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने अहं के चलते पानी देने से रोक दिया और हास्यास्पद स्थिति तब पैदा हो गई जब पता चला कि उसमें पानी ही नहीं था। इस स्थिति को प्रहसन में तब्दील कर दिया गया जब जिला प्रशासन ने खाली पडी ट्रेन में सात लाख लीटर पानी खुद भरवा दिया और यह पानी एक पत्रकार की जान लेने तक यार्ड में टैंकरों के भीतर पड़ा खौलता रहा। अब झांसी और महोबा के जिला कलक्टरों ने साफ कह दिया है कि इस क्षेत्र के लिए इस ट्रेन की कोई उपयोगिता नहीं है। नतीजा यह हुआ है कि लोग भूख-पास से मर रहे हैं लेकिन 4 मई से लगातार यह ट्रेन झांसी में खड़ी है। किसी को नहीं पता कि सात लाख लीटर पानी का बिल कौन चुकाएगा।
ऐसे में झांसी प्रवेश करते ही हाइवे के किनारे पड़ी एक बछड़े की सूखी लाश कई सवाल पैदा करती है। अगर केंद्र सरकार मानती है कि 33 करोड़ लोग प्यास से मर रहे हैं तो सात लाख लीटर पानी को धूप में इस तरह क्यों खौलने दिया जा रहा है। लोग अपना पेट नहीं भर पा रहे हैं लिहाजा उन्होंने अपने मवेशियों को सड़क पर खुला छोड़ दिया है। झांसी से ललितपुर के बीच एनएच-26 पर और ओरछा की ओर एनएच-12ए पर गांयों-बछड़ों का जमघट लगा है। पानी की कमी के चलते लोगों ने मवेशियों को सड़कों पर इस कदर खुला छोड़ दिया है कि चालीस किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से लगातार एक किलोमीटर चल पाना भी मुश्किल है। गायों के लिए ऐसा अकाल बुंदेलखंड में कभी नहीं आया था, हालांकि सड़क पर अपनी मौत के इंतज़ार में टहलती इन गायों को ललितपुर के कचनौंदा की गायों से रश्क होता होगा जो फिलहाल गुड़गांव की इम्पोर्टेड घास खाने का सुख ले रही हैं। महज डेढ़ सौ किलोमीटर के भीतर फैली विरोधाभास की यह तस्वीर इंसानी गुरबत की हकीकत को खोलकर रख देती है।
झांसी के यार्ड में दो हफ्ते से खड़ी पानी की ट्रेन विकास के उसी भ्रामक मॉडल का परिणाम है जिसके नक्शे कदम पर कचनौदा में 425 करोड़ की लागत से उत्तर प्रदेश का पहला ऑनलाइन बांध बनाया गया है। ललितपुर से करीब चालीस किलोमीटर दूर सजनाम नदी के ऊपर यूपी का पहला ऑनलाइन प्रबंधित बांध बना है कचनौंदा बांध। इसका लोकार्पण हुए चार साल हो गया हालांकि पिछले साल अक्टूबर में पहली बार आए पानी के बाद से नदी अब तक सूखी है। यह बांध भुखमरी के साम्राज्य के बीच अश्लीलता का एक ऐसा हरा-भरा टापू है, जहां हर रोज़ शाम को बाइक सवार प्रेमी जोड़े और संपन्न परिवार पिकनिक मनाने आते हैं। बांध के ऑपरेटर लखनऊ निवासी संजय यादव को इस बात का दुख है कि 65,000 रुपये प्रति ट्रक के हिसाब से गुड़गांव से मंगाई गई इम्पोर्टेड घास पानी के अभाव में पीली पड़ रही है और उसे गायें चर रही हैं। वे कहते हैं, ”करोड़ों रुपये की घास यहां लगाई गई है। ये जो लाइट के पोल आप देख रहे हैं, इनके एक बल्ब की कीमत 18000 रुपये है।”
इम्पोर्टेड घास, बच्चों की खिलौना ट्रेन और महंगी लाइटों की आड़ में पानी की उस नीली झील को छुपा पाना नामुमकिन है जिसमें फाइबर की रंगीन नावें खड़ी हैं। यहां सैलानियों के लिए बोटिंग की सुविधा की गई है जबकि महज आधा किलोमीटर दूर नदी में बचा-खुचा गंदला पानी लोगों की प्यास बुझाने के काम आ रहा है। यह बांध अपनी तय भूमिका के अलावा दूसरे सारे काम कर रहा है क्योंकि अब तक इस बांध से नहरें नहीं निकली हैं। नहरें निकलेंगी, इसकी संभावना कम ही लगती है क्योंकि स्थानीय जानकारों के मुताबिक इसे बनाने का मूल उद्देश्य बजाज कंपनी के उस थर्मल पावर प्लांट को पानी देना है, जिसकी चिमनी बांध से साफ दिखाई देती है। एक आलीशान गेस्ट हाउस भी बांध के भीतर है जहां स्थानीय लोगों के मुताबिक बजाज कंपनी के मालिक राहुल बजाज आकर विश्राम करते हैं। उसके अलावा सुरक्षा के लिए एक पुलिस चौकी भी परिसर में बनाई गई है, यह बात अलग है कि बांध पर नज़र रखने वाला सीसीटीवी कैमरा खराब पड़ा हुआ है। संजय बताते हैं, ”उसका सॉफ्टवेयर खराब हो गया है। चेन्नई बनने के लिए भेजा गया है।”