संघर्ष संवाद
Sangharsh Samvad

दमनकारी कानूनों के विरूद्ध: सम्मेलन

गुजरी 20 जनवरी को चंडीगढ़ में गदर आंदोलन की 100वीं बरसी के अवसर पर दमनकारी कानून विरोधी कमेटी, चंडीगढ़ के बैनर तले दमनकारी कानूनों के खिलाफ एक दिवसीय सम्मलेन का आयोजन किया गया। सम्मलेन में राजविन्द्र सिंह बैंस एडवोकेट (पंजाब ह्यूमैन राइट आर्गेनाइजेशन, पीएचआरओ), प्रो. जगमोहन सिंह (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट, पंजाब, एएफडीआर ), पंकज त्यागी (पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल राइट, हरियाणा, पीयूसीआर), एसिसटैंट प्रो. जतिन्द्र सिंह (अहद), एडवोकेट आरती, (लोकायत, चण्डीगढ़) तथा दमनकारी कानूनों से पीड़ितों ने अपने विचार रखे.

ज्ञात रहे कि अंग्रेज हुक्मरानों ने भी गदर आंदोलनकारियों का दमन करने के लिए ‘डिफैंस ऑफ इंडिया एक्ट, 1915’ नामक दमनकारी कानून का प्रयोग किया था। इसी के बाद जलियावाले बाग में सैंकड़ों लोगों ने दमनकारी कानून ‘रौल्ट एक्ट’ को रद्द करवाने के लिए शहादत तक दी थी। शहीद भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने एसेम्बली में बम्ब फैंककर दमनकारी कानून ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ का ही विरोध किया था। इसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए यह सम्मलेन किया गया। पेश है दमनकारी कानूनों के खिलाफ कन्वैंशन में एसिस्टैंट प्रो. जतिन्द्र सिंह द्वारा प्रस्तुत पेपर;

सन् 1947 में संविधान सभा के भीतर बहस के आरंभिक दिनों में उद्देश्यों से संबंधित प्रस्ताव पारित होने के बाद भारतीय राजनैतिक नेतृत्व की एक अति आदरणीय शख्सीयत डा. राधाकृष्णन ने सभा के सदस्यों के सामने एक भाषण दिया था।वास्तव में यह भाषण उन लोगों द्वारा खड़ी की गयी चुनौतियों का सामना करने के लिए एक आह्वान था जिन्होंने संविधान सभा की क्षमता पर गंभीर सवाल उठाए था, क्योंकि संविधान सभा औपनिवेशिक ताकतों द्वारा भारत को एक गुलाम अवस्था से आजादी की ओर ले जाने के लिए बनाए गए केबिनेट मिशन के दिमाग की उपज था। डा. राधाकृष्ण के लिए संविधान सभा वास्तविक कार्य उन लोगों को उचित जबाव देना था ‘जिन्हें सविंधान सभा पर संदेह था, जो ढुलमुल थे, जो इसके खिलाफ थे और जो सविंधान सभा के काम को बहुत गलत नजरिए से देखते थे।’

अपने भाषण में वे जनता को दो महत्वपूर्ण भागों में बांट रहे थे। पहले वे जिन्हें संविधान सभा में विश्वास था और दूसरे जो इसकी क्षमता को और स्वतंत्र भारत की राजसत्ता के इसके दृष्टिकोण पर सवाल उठा रहे थे। विविध प्रकार की राय, दृष्टिकोणों और विचारों पर चिंतनमनन कर उन्हें उस समय के हावी दृष्टिकोण में शामिल करने की बजाय उन्होंने इनके प्रति बेहद घृणात्मक रुख अपनाया। संविधान सभा को आधारशिला के रूप में देखा गया और इसे ही आगे बढ़ने के एकमात्र रास्ता माना गया। विभिन्न कारणों के कारण सभा के बाहर रह गए लोगों को न केवल संविधान सभा के प्रति ही, बल्कि भारत को एक ‘स्वतंत्र’, ‘संप्रभु’ और ‘गणराज्य’ बनाने के स्वप्न के प्रति भी ‘शत्रु’, ‘ढुलमुल’ और ‘अति अविश्वसनीय’ तत्वों के रूप में देखा गया। इस प्रकार एकदम शुरुआत से ही सीमा-रेखा और युद्ध-रेखा का निर्धारण कर दिया गया। भारतीय राजसत्ता ने अपनी यात्रा एक ऐसे मजबूत परामर्श से शुरु की जिसके अनुसार ‘जो कोई भी शासक वर्गों द्वारा प्रचारित आजाद भारत के बारे में बने प्रभुत्वशाली विचारों का विरोध करेगा या उनके प्रति संदेह व्यक्त करेगा, उसे शत्रुतापूर्ण नजरिए से देखा जाएगा, उसे राष्ट्रविरोधी समझा जाएगा और उसे राष्ट्र निर्माण के विचार और प्रक्रिया के लिए खतरा समझा जाएगा।’ यह सोच आज तक जारी है।

यह एक कड़वी सच्चाई है कि एक तरफ भारतीय राजसत्ता संविधान में मौलिक अधिकारों पर बहस करते हुए उन्हें संविधान में लिख रही थी, दूसरी ओर उसके सुरक्षा बल तेलंगाना की गलियों में, अनिच्छुक रियासतों में, पूर्वोत्तर इलाके में और कश्मीर में वहां की जनता को कुचलते हुए, उनका कत्ल करते हुए और बलात्कार करते हुए उन्हें आधुनिक भारतीय राजसत्ता का हिस्सा बनने के लिए बाध्य करने के लिए उन्हीं मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर रहे थे। इस प्रकार तेलंगाना के किसानों को, विभिन्न राष्ट्रीयताओं के लोगों को ‘दुश्मन’ और राष्ट्र विरोधी समझ लिया गया। दुखद बात यह है कि संविधान सभा को इस प्रकार के दमन और अधिकारों के उल्लंघन की कोई भी चिंता नहीं थी। इन दोनों प्रक्रियाओं की समकालीनता स्पष्ट तौर पर दिखाती है कि केबिनेट मिशन योजना के तहत गठित ‘मौलिक अधिकारों के बारे में बनी उप-कमेटी’ असल में केवल उन लोगों के मौलिक अधिकारों के बारे में सोच रही थी जो शासक वर्गीय विचारों और दृष्टिकोण से सहमत थे। मौलिक अधिकारों के उन महान चैंपियनों ने मानवाधिकारों के इन उल्लंघनों के प्रति अपनी आंखें मूंद ली थीं।

अपने सुरक्षा बलों द्वारा बिना किसी कानूनी डर के इन अधिकारों का और भी ज्यादा उल्लंघन करने की कार्रवाइयों को कानूनी जामा पहनाने के लिए भारतीय राजसत्ता ने चैतरफा रणनीति पर काम किया। पहला, अपने ‘नागरिकों’ द्वारा मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल करने पर इसने बहुत से प्रतिबंध लगा दिए हैं और संविधान में अनुच्छेद 22(7) डाल दिया है जो संसद को निवारक बंदी कानून (preventive detetion laws) लागू करने की इजाजत दे देता है। दूसरा, इसने आईपीसी और सीआरपीसी की कई दमनकारी धाराओं को बनाए रखा है जैसे धारा 144 आइपीसी, जो किसी भी सभा को ‘गैरकानूनी’ घोषित कर सकती है, धारा 124 ए आईपीसी जो ‘देशद्रोह’ के मामलों को देखती है, धारा 121 आईपीसी जो ‘सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने’ से संबंधित मामलों से सम्बंधित हैं। इसी प्रकार औपनिवेशिक समय के दमनकारी कानून जैसे आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम,1908 और भारत सुरक्षा कानून भी ज्यों के त्यों बने रहे। तीसरा, इसने समय समय पर आईपीसी और सीआरपीसी की विभिन्न धाराओं में और इंडियन एवीडंेस एक्ट,1872 जैसे स्थायी कानूनों में संशोधन किये हैं, ताकि आरोपियों को बचाव के कम से कम रास्ते मिल सकें। चैथा, इसने कुछ नए दमनकारी कानून पारित किए और उनमें अनेक संशोधनयह कहते हुए किए कि चूंकि परिस्थितियां असामान्य हो चुकी हैं और इन आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए आईपीसी और सीआरपीसी जैसे साधारण कानून पर्याप्त नहीं हैं और स्थिति को पुनः सामान्य’ और ‘शांतिपूर्ण’ बनाने के लिए सुरक्षा बलों को असाधारण कानूनों के कवर की जरूरत है।

असाधारण कानूनों की श्रेणी के कानूनों जैसे कि टाडा और में तो संसद द्वारा इन कानूनों की समीक्षा का प्रावधान भी था, जिससे उनके रद्द किए जाने की संभावनाएं बनी रहती थी। लेकिन गैरकानूनी गतिविधि निरोधक कानून,1967 में तो ऐसा प्रावधान भी नहीं है और यह वैधानिक किताबों में एक आम कानून की तरह ही दर्ज है। हालांकि अधिकतर मामलों में रद्द किए जाने का प्रावधान भी ज्यादा मददगार साबित नहीं हो पाता, जैसा कि सर्वाधिक कुख्यात काले कानून सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून 1958 के मामले में देखने को मिलता है जिसे इसे रद्द करने के लिए जबर्दस्त मांग करने के बावजूद संसद और केंन्द्र सरकार अभी भी इस कानून को पूर्वोत्तर और काश्मीर में जारी रखे हुए है। यह विशेष कानून इन क्षेत्रों का एक स्थायी चरित्र बन गया है। इन सभी तौर-तरीके को ‘कानून और व्यवस्था बनाए रखने’ और ‘राष्ट्रीय एकता, अखण्डता और संप्रभुता’ की रक्षा करने के नाम पर उचित ठहराया जाता रहा हैं। इस संदर्भ में, केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों ही इस रणनीति का हिस्सा रही हैं। इस प्रकार, भारतीय कानून व्यवस्था इन सभी प्रकार के हथकण्डों का मिश्रण बनी हुई है। इस तरह, सभी दमनकारी कानून और प्रावधान भारतीय राजसत्ता की बुनियाद में ही मौजूद हैं। इन दमनकारी कानूनों के बिना भारतीय राजसत्ता का ढांचा बरकरार नहीं रह पायेगा।

फरवरी, 1950 को, जब भारत को ‘गणराज्य’ बने कुछ माह ही हुए थे, शासक वर्गों ने स्वतंत्र भारत का पहला ‘निवारक बंदी कानून’ पारित कर दिया। शुरुआत में इसे दो सालों के लिए पारित किया गया था लेकिन इसे छः बार बढ़ाया जाता रहा और भारत की वैधानिक पुस्तकों में यह कानून 11 साल तक मौजूद रहा। मार्च, 1950 में मद्रास राज्य ने पिपुल्स एजुकेशन सोसाइटी, मद्रास को आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 1908 के तहत गैरकानूनी संस्था घोषित कर दिया। संविधान के लागू होने के महज 15 महीने बाद इसे संशोधित करने की जरूरत पड़ गयी। पहले संशोधन की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी कि इसमें अनुच्छेद 19 के तहत दिए मौलिक अधिकारों का अभ्यास को प्रतिबंधित करने के एक कारण के रूप में ‘पब्लिक व्यवस्था कायम करने’ को जोड़ दिया और प्रतिबंधों से पहले ‘यथोचित’ शब्द जोड़ दिया। यह सारा काम एक ऐसी सरकार के द्वारा किया गया, जिसे अभी तक भारत की जनता ने चुना भी नहीं था, क्योंकि भारत के पहले आम चुनाव सन् 1952 में हुए थे।

दूसरी लोकसभा ने वर्ष 1958 में पूर्वोत्तर क्षेत्र के राष्ट्रीयता के संघर्षों को कुचलने के मकसद से सर्वाधिक कुख्यात और दमनात्मक सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून पारित किया। तीसरी लोकसभा ने संविधान संशोधन (सोलहवां) अधिनियम 1963 पारित किया जिसने ‘यथोचित प्रतिबंधों’ की सूची में ‘भारत की संप्रुभता और अखंडता के हित में’ शब्दों को जोड़ कर आजादी की अभिव्यक्ति को और ज्यादा सीमित कर दिया। ऐसा राष्ट्रीय एकीकरण कौंसिल द्वारा गठित राष्ट्रीय एकीकरण और क्षेत्रवाद पर कमेटी की सिफारिशों के आधार पर किया गया था। इसने सिफारिश की थी कि भारत की एकता और अखंडता को कायम रखने के लिए पर्याप्त शक्तियां मुहैया करवाई जानी चाहिएं। इसने गैरकानूनी गतिविधी (निरोधक) अधिनियम 1967 {यूएपीए, 1967} को पारित करने के लिए रास्ता खोल दिया। उसके बाद आंतरिक सुरक्षा अधिनियम मीसा, आवश्यक सेवा अधिनियम एसमा, टाडा, पोटा और बड़ी संख्या में अन्य दमनकारी कानून केंद्र और राज्य सरकारों की वैधानिक पुस्तकों का हिस्सा बनने लगे। वर्ष 1950 से लेकर आज तक इस प्रकार लागू किए गए कानूनों की संख्या और संविधान एवं आईपीसी तथा सीआरपीसी की धाराओं में किए गए संशोधनों की संख्या अंतहीन हो गयी है।

हर गुजरते साल के साथ कानून ज्यादा से ज्यादा सख्त होते जा रहे हैं और उनके रद्द होने से भी भारत की जनता को कोई राहत नहीं मिली है। उनकी विभिन्न धाराएं या तो नए कानूनों में शामिल कर ली गयीं या फिर मौजूदा कानूनों में संशोधन कर उनमें शामिल कर ली गयीं। वर्ष 2004 के बाद यूएपीए, 1967 में संशोधन इसका एक ज्वलंत उदाहरण है क्योंकि यह कई ज्यादा सख्त अनुच्छेदों के साथ पुराने मीसा, टाडा और पोटा का एक नया संस्करण ही है। इसे असाधारण परिस्थितियों से निपटने के मकसद से भी पारित किया गया है जैसे कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ‘खतरे’ के संकट से निपटने के लिए। इस कानून को वर्ष 1967 में पारित किया गया था और इसके तहत कुछ खास गतिविधियों को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया। यह पहला केंद्रीय कानून था जिसने केंद्र सरकार को यह शक्ति दी कि वह किसी भी संस्था को ‘गैरकानूनी गतिविधियों’ में संलिप्त कहकर प्रतिबंधित घोषित कर सकती थी।

यह जानना मजेदार होगा कि सितम्बर 2004 में भारत के राष्ट्रपति ने दो अध्यादेष जारी किए। पहला आतंकवाद गतिविधी निरोधक कानून 2002 (पोटा 2002) को आधिकारिक तौर पर रद्द करने के लिए और दूसरा यूएपीए 1967 में संशोधन के लिए। शीतकालीन अधिवेशन में संसद के दोनों सदनों ने इन अध्यादेशों को स्वीकृति दे दी। पोटा को आधिकारिक तौर पर रद्द कर दिया गया लेकिन इसके ज्यादातर अनुच्छेदों को संशोधित यूएपीए 1967 में शामिल कर दिया गया। पोटा को रद्द करते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने, जिसमें वामपंथी पार्टियां एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में मौजूद थीं, स्वयं को मानवाधिकारों के महान रक्षक के रूप में पेश किया। इसने वायदा किया कि यूएपीए में पर्याप्त सुरक्षात्मक उपाय किये जाएंगे ताकि आतंकवाद से निपटने के दौरान किसी भी प्रकार के दुरुपयोग को रोका जा सके।

इसके रद्द होने पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने यूपीए सरकार पर आरोप लगाया था कि ‘वह राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता कर रही है और यह मुसलमानों का तुष्टीकरण करने की कांग्रेस की बृहद योजना का एक हिस्सा है।’ इसके वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण अडवाणी ने हैरानी प्रकट करते हुए कहा कि ‘देश में काला बाजारियों और नशीली दवाइयों के तस्करों के खिलाफ सख्त कानून है लेकिन आतंकवादियों और आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कानून नर्म है।’ बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस पार्टी पर आरोप लगाया कि उसने ऐसा फैसला ‘मनुवादी पार्टियों के दबाव में’ लिया है।

उस वक्त की तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जे जयललिता ने कहा कि ‘इस कानून के रद्द होने से आतंकवाद से ‘देश की रक्षा’ करने में एक शून्य पैदा हो गया है।’ इसमें 2008 में पुनः संशोधन किया गया और दिसंबर 2012 के संसद के शीतकालीन सत्र में एक बार फिर कुछ संशोधन किये गये – हर बार बिना किसी खास बहस के। राजनीतिक पार्टियों ने अनुमान के अनुसार ही प्रतिक्रिया दी। सत्ता पक्ष की ओर से बैठते हुए वे आतंकवाद विरोधी कानून संसद के पटल पर लेकर आये और विपक्षी खेमे में बैठ कर उन्होंने सत्ता पक्ष के कदमों की आलोचना की है। संसद में उनकी अवस्थिति के मुताबिक उनके तर्क बदलते रहे हैं।

इस राजनीतिक उठापठक के बीच काले कानूनों और अनुच्छेदों का दायरा बढ़ता रहा और नई-नई गतिविधियां ‘गैरकानूनी’ और ‘राष्ट्र विरोधी’ के रूप में घोषित की जा रही हैं। यूएपीए 1967 केवल ‘गैरकानूनी गतिविधियों’ से निपटने के लिए बनाया गया था परंतु वर्ष 2004 में संशोधनों के दौरान आतंकवाद से संबंधित अनुच्छेद भी इस कानून में जोड़ दिये गये और यह आतंकवाद निरोधक कानून बन गया।

वर्ष 2008 में यूएपीए 1967 में प्रस्तावना डाल कर इसके अंतर-राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य को और विस्तारित कर दिया गया। ऐसा करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के प्रति भारतीय राजसत्ता की वचनबद्धता को दोहराया गया। वर्ष 2012 में किया गया संशोधन एक अंतर-राष्ट्रीय संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की वजह से था। सर्वाधिक अमीर और विकासशील देशों के सबसे बड़े शोषक जी-7 देशों के समूह के द्वारा वर्ष 1989 में इसका गठन किया गया था। आधिकारिक तौर पर इसका काम काले धन के विदेशी बैंकों में गैरकानूनी तौर पर हस्तांतरण के खिलाफ कार्रवाई करना था लेकिन असल में इसने अमरीका और पश्चिमी युरोपीय देशों की साम्राज्यवादी शक्तियों के बैंकों और वित्तीय संस्थानों की रक्षा की है। यह याद रखा जाना चाहिए कि जी-7 1970 के दशक के अंत में अस्तित्व में आया था और इसने उग्र रूप से नव-उदारवादी एजेंडा को लागू किया था। चूंकि भारत इसका पूर्ण सदस्य 2010 में बना था इसलिए इसके दिशानिर्देशों का पालन करने के लिए ये संशोधन किये गये थे।

वर्ष 2004 में अनुच्छेद 2 (ओ) ‘गैरकानूनी गतिविधियों’ की सूची में एक नई गतिविधी ‘जो भारत के प्रति वैमन्षय पैदा करती हो या करने की इच्छा रखती हो’, डाल दी गयी। ऐसा न तो असंशोधित यूएपीए में था और न ही पोटा में। वर्ष 2004 में प्र्रतिबंधित संगठनों की संख्या पोटा में 25 से बढ़ा कर 32 कर दी गयी। वर्ष 2008 में ‘संयुक्त राष्ट्र संघ की आतंकवाद को रोकने और खत्म करने के लिए बनाई अनुसूची’ में शामिल संगठनों को प्रतिबंधित संगठनों की अनुसूची में डाल दिया गया। वर्ष 2012 में दो और अनुसूचियां इस लिस्ट में डाल दी गयीं जो विभिन्न अंतर-राष्ट्रीय कन्वैंशनों व प्रोटोकोल से और उच्च गुणवत्ता वाले नकली नोटों की पहचान के लिए सुरक्षा उपायों से संबंधित थीं। इस प्रकार इस सूची को अंतहीन बना दिया गया। ये अनुसूचियां इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि किसी भी संगठन को प्रतिबंधित घोषित करने संबंधी घोषणा पूरी तरह भारतीय शासक वर्गों और अमरीका के नेतृत्व में साम्राज्यवादी शक्तियों की मनमर्जी पर निर्भर करती है।

केंद्र सरकार बिना संसद पटल पर किसी प्रकार की चर्चा किए केवल एक अधिसूचना जारी करके इन दोनों अनुसूचियों को आसानी से संशोधित कर सकती है। यद्यपि इस अधिसूचना को ‘शीघ्र अति शीघ्र’ संसद के सामने रखा जाएगा जिसका अर्थ यह है कि इसके लिए कोई समय सीमा नहीं रखी गयी है और इस पर निर्णय लेने का अधिकार पूरी तरह सरकार के पास रहेगा। दूसरा चिंता का विषय यह है कि जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हमारी संसद कितनी गंभीर है, इन अधिसूचनाओं को बिना किसी बहस के संसद में स्वीकार कर लिया जाएगा। चूकि यह संशोधन संसद द्वारा पारित किया जा चुका है, इसका अर्थ यह है कि अपने आचरण के द्वारा इसने खुद अपनी जड़ें खोद ली हैं।

वर्ष 2012 में संशोधन के साथ किसी संस्था को जिसे गैरकानूनी और इस प्रकार प्रतिबंधित घोषित कर दिया गया हो, उसकी पुनर्समीक्षा की समय सीमा को भी दो वर्ष से बढ़ा कर पांच वर्ष कर दिया गया है। ऐसा इस हास्यापद कुतर्क के आधार पर किया गया है कि इससे सही ढंग से डाटा, खुफिया जानकारियां, कोर्ट में दर्ज विभिन्न केसों की स्थिति के बारे में नवीनतम जानकारी, राज्य सरकार से पुलिस द्वारा ली गयी मंजूरी की अवस्थिति के बारे में आंकड़े इकट्ठा करने और उसे संकलित करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा। एक अन्य कारण है प्रतिबंध के प्रशासकीय खर्चों में कटौती में मदद करना। दूसरे शब्दों में समय सीमा में वृद्धि पुलिस या जांच एजेंसियों की मदद करने के लिए है न कि प्रतिबंधित संगठनों की। सबसे बढ़ कर यह जनवादी अधिकारों का सबसे घृणित उल्लंघन है कि सरकार पहले तो किसी संगठन को प्रतिबंधित कर दे और बाद में इसे प्रमाणित करने के लिए कारणों की तलाश करे। किसी भी संस्था के लिए अन्यथा साबित करना लगभग असंभव है क्योंकि किसी ट्रिब्यूनल या सर्वोंच्च न्यायालय के सामने प्रार्थना करने के अलावा प्रत्येक गतिविधि को ‘गैरकानूनी’ माना जाने लगा है। इसलिए वे प्रतिबंध का मजबूती के साथ विरोध करने के लिए जनता की राय को अपने पक्ष में करने के लिए काम नहीं कर सकते। पुनः किसी ट्रिब्यूनल का गठन करना उसी सरकार का विशेषाधिकार है जिसने प्रतिबंध लगाया है। अगर वह ट्रिब्यूनल प्रतिबंध को गैरकानूनी घोषित भी कर देता है तो सर्वोच्च न्यायालय इस निर्णय को पलट देता है। सिम्मी के खिलाफ प्रतिबंध का मामला इसका ज्वलंत उदाहरण है। सिम्मी को वर्ष 2001 में प्रतिबंधित कर दिया गया था। सिम्मी पर प्रतिबंध की सुनवाई के चैथे अवसर पर वर्ष 2008 में जस्टिस गीता मित्तल ने प्रतिबंध को गैरकानूनी घोषित कर दिया। इसे सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी और देश के सर्वोच्च न्यायालय ने उस निर्णय को पलट दिया। सरकार और सर्वोच्च न्यायालय की इच्छा स्पष्ट थी क्योंकि सिम्मी की तरफ से पहले के तीन प्रतिबंधों के खिलाफ दायर याचिकाएं वर्ष 2008 तक सर्वोच्च न्यायालय के पास लंबित पड़ी थीं।

वर्ष 2012 में संशोधन के बाद अनुच्छेद 2 (इ ए) जोड़ दिया गया है जिसमें ये शब्द शामिल हैं-‘लोगों की संस्था या व्यक्तियों का समूह, चाहे वो संगठित हो या न हो’। इन संशोधनों की वजह से किसी संस्था का अर्थ इस हद तक विस्तृत हो गया है कि तीन-चार व्यक्तियों का कोई भी समूह ‘गैरकानूनी’ घोषित किया जा सकता है। घरेलू मामलों पर केंद्र सरकार की स्टैंडिग कमेटी ने इस बात चिंता जाहिर की है कि इससे निर्दोष लोगों के उत्पीड़न की संभावना बढ़ती है क्योंकि यह अनुच्छेद जांच अधिकारी को अतिरिक्त अधिकार दे देता है। कमेटी को डर था कि ट्रेड यूनियनों को भी इसमें शामिल किया जा सकता है और उन्हें परेशान किया जा सकता है। इसमें मजदूरों की यूनियनें, क्लब एसोसिएशन, फुटबाल एसोसिएशन आदि को भी शामिल किया जा सकता है। लेकिन स्टैंडिंग कमेटी के इन संशोधनों के प्रभावों की समीक्षा करने के प्रस्ताव पर जरा सा भी नहीं सोचा गया। यूएपी बिल 2011 को घरेलू मामलों की स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजने की पूरी कवायद मात्र एक ढकोसला साबित हुई है।

सैक्शन 15, जो ‘आतंकवादी गतिविधियों के लिए सजा’ से संबंधित है, पोटा से लिया गया है और इसे वर्ष 2004 में यूएपीए में डाल दिया गया और वर्ष 2008 में इसमें और चीजें जोड़ दी गयीं। वर्ष 2012 में ‘आर्थिक सुरक्षा’ और ‘भारत की एकता, अंखडता, सुरक्षा और संप्रभुता के लिए खतरा होना या उसकी संभावना होना’ शब्द डाल दिए गए हैं जिसका अर्थ है कि कोई भी चीज जिससे भारत की अर्थव्यवस्था अस्थिर होती हो, उसे गैरकानूनी गतिविधी’ और ‘आतंकवादी कार्रवाई’ माना जा सकता है। इसके तहत उच्च गुणवत्ता वाले नकली नोटों के उत्पादन और वितरण को आपराधिक घोषित करने के लिए इसमें और संशोधन किया गया है जबकि ये कार्रवाइयां पहले ही भारतीय दंड संहिता की धारा 489बी, 489सी, 489डी के तहत कवर हो जाती हैं। अनुभव बताता है कि जब एक ही प्रकार की व्यवस्था आतंकवाद निरोधक कानून और आईपीसी दोनों में होती है तो पुलिस में आतंकवाद निरोधक कानून के तहत मामले दर्ज करने का रूझान रहता है। इसका अर्थ हुआ कि सुरक्षा बलों को ज्यादा शक्तियां प्रदान कर दी गयी हैं और आरोपी के पास बचाव के कम उपाय रह गये हैं।

बचाव के उपायों के संदर्भ में, गृह सचिव ने स्टैंडिंग कमेटी को बताया कि ‘ऐसी व्यवस्था है कि अगर कोई व्यक्ति, या संस्था या कंपनी का व्यक्ति आतंकवाद से जुड़ा हुआ नहीं है, वह इस मकसद के लिए प्रमाण पेश कर सकता है कि वह इन गतिविधियों में शामिल नहीं है। यह है बचाव का रास्ता। वह प्रमाण प्रस्तुत कर सकता है कि वह इनसे जुड़ा हुआ नहीं है।’ कुछ गलतियों को स्वीकार करने के बावजूद गृह सचिव का अभी भी यही मानना है कि निर्दोष साबित करने की जिम्मेवारी स्वयं आरोपी की है। वह अभी भी इसी बात पर अड़ा है कि अगर कोई व्यक्ति निर्दोष है तो उसे इस बात का सबूत लाना चाहिए और इसे अदालत के सामने पेश करना चाहिए। इस प्रकार अंततः बचाव का रास्ता यह हुआ कि कानून आपको दोषी मानेगा जब तक कि आरोपी खुद को निर्दोष साबित नहीं कर देता।

दुखद पहलू यह है कि वर्ष 2012 में ये सभी संशोधन राज्य सरकारों को सूचित किए बिना कर पारित कर दिये गये। कमेटी द्वारा पूछे जाने पर कि क्या बिल को आगे बढ़ाने से पहले राज्य सरकारों से परामर्श किया गया था?, गृह सचिव ने नकारात्मक जबाव दिया कि उसे नहीं लगता कि ऐसा कुछ हुआ था। क्योंकि फाइनैंशियल एक्शन टास्क फोर्स द्वारा उठाए तमाम मुद्दे केंद्र सरकार से संबंधित हैं। अफसरशाहों और केंद्र सरकार के दिलों में भारतीय नीति के संघीय चरित्र के प्रति जरा सा भी आदरभाव नहीं है। वास्तव में कुछ कार्रवाइयों को आतंकवादी कार्रवाइयां घोषित करते हुए यह शाक्तियों के केंद्रीकरण का एक और प्रयास है। वे इतना भी जरूरी नहीं समझते कि इस विषय पर राज्य सरकारों से बात की जाये। यह भी उतना ही सच है कि राज्य सरकारें भी इन विषयों को लेकर जरा सा भी गंभीर नहीं हैं क्योंकि केवल एक राज्य (कर्नाटक) और एक केंद्र प्रशासित प्रदेश (दमन और दीऊ) ने ही स्टैंडिंग कमेटी द्वारा संशोधनों की समीक्षा करने के मामले में विचार प्रस्तुत करने के आमंत्रण के प्रति रूचि दिखाई थी। उन्होंने भी इन संशोधनों के पक्ष में अपने विचार रखे थे। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के गठन और नेशनल काउण्टर टेरोरिज्म सेंटर (एनसीटीसी ) के गठन के लिए जबर्दस्त प्रयासों का मकसद भी केंद्र के हाथ में असीमित शक्तियां सौंपना है ताकि राज्यों के दिन-प्रतिदिन के मामलों में भी हस्तक्षेप किया जा सके। ये केन्द्रीय कानून और संस्थाएं भारतीय यूनियन के संघीय चरित्र के खोखलेपन का पर्दाफाश करते हैं।

जैसा कि हमने ऊपर चर्चा की है, यूएपीए को राष्ट्रीय एकीकरण और क्षेत्रवाद पर कमेटी की सिफारिशों के अनुसार पारित किया गया था। इस कमेटी का गठन 1960 के दशक के आरंभ में गहराते आर्थिक संकट और राज्यों और क्षेत्रीय स्वायतता के लिए बढ़ते संघर्षों के साथ साथ राष्ट्रीयता के संघर्षों के संदर्भ में किया गया था। आर्थिक संकट से निपटने के लिए आंतरिक संसाधन जुटाने के स्थान पर भारतीय राजसत्ता ने बाहरी कर्ज के विकल्प को चुना। इस कर्ज को उपलब्ध करवाने के लिए विश्व बैंक और आईएमएफ ने अपनी शर्तों और आदेशों को मानने के लिए बाध्य किया जिन्हें इंदिरा गांधी ने 5 जून, 1966 को स्वीकार कर लिया। अगले ही साल, दिसबंर 1967 में भारतीय कानून व्यवस्था की वैधानिक पुस्तकों में यूएपीए शामिल कर दिया गया।

वर्ष 1991-92 के ऐतिहासिक बजट भाषण, जिसे उस वक्त के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने दिया था, ने भारतीय अर्थव्यवस्था के दरवाजे विदेशी पूंजी के लिए पूरी तरह खोल दिए गए। नवउदारवाद यानि वर्तमान दौर के साम्राज्यवाद के नेतृत्व में उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण की नीतियों की वजह से समाज के व्यापक हिस्सों का बड़े पैमाने पर कंगालीकरण हुआ है। वैश्विक पैमाने पर आर्थिक मंदी का परिदृश्य उभर रहा है और पश्चिमी देशों में अतिरिक्त उत्पादन की संभावनाएं बेहद कम हैं। इसलिए विदेशी पूंजी भारत जैसे देशों की ओर देख रही है ताकि श्रम और प्राकृतिक संसाधनों जैसे जल, जंगल और जमीन का दोहन किया जा सके। इन नीतिगत व्यवस्थाओं के माध्यम से भारत के शासक वर्गों को लूट का उनका हिस्सा मिल रहा है। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि पूंजी में नीतियों, कानूनों और नियमों तथा नियामकों के मानकीकरण और समांगीकरण का रूझान होता है जिसका अर्थ है कि भारतीय यूनियन अपने संघ विरोधी चरित्र के साथ शक्तियों के और ज्यादा केंद्रीकरण का मार्ग अपनाएगी। कर प्रणाली, पानी, शिक्षा, आधारभूत ढांचे का विकास, स्वास्थ्य, और राज्यों के अन्य विषयों का केंद्रीकरण करने का प्रयास इस प्रक्रिया का एक आवश्यक पहलू है। यह राज्यों को शानदार नगरपालिकाओं के स्तर तक पंहुचा रहा है। साम्प्रदायिकता के मामले में नवउदारवादी एजंेडा अयोघ्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ अनावृत हुआ है। ये दोनों प्रकार की शक्तियां पक्के गठजोड़ के रूप में काम कर रही हैं और भारतीय जनता के खिलाफ सर्वाधिक बुरे किस्म का आतंक कायम कर रही हैं।

परिणाम स्वरूप, भारतीय शासक वर्ग व्यापक तौर पर जन संघर्षों का सामना कर रहे हैं। इसमें व्यापक तौर पर हो रहे विस्थापन के खिलाफ आंदोलन, सम्मानजनक जीवन और आजीविका के अधिकार के लिए आंदोलन, साम्प्रदायिकता के खिलाफ, परमाणु ऊर्जा के खिलाफ, बांध विरोधी, सामंतवाद विरोधी, जातीय भेदभाव और उत्पीड़न के खिलाफ, यौन हिंसा के खिलाफ और लैंगिक बराबरी के लिए, जमीन के अधिग्रहण के खिलाफ, भूमि सुधारों के लिए और राष्ट्रीयता के आंदोलन शामिल हैं। ये सभी आंदोलन किसी न किसी रूप में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के साम्राज्यवादी नीतिगत ढांचे के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ के उन्माद को भी नवउदारवाद ने अपने सर्वाधिक सफलता वाले दिनों में बहुत बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जिसके चलते अल्पसंख्यक समुदाय ‘संदेहास्पद’ समुदायों में बदल दिये गये। पूरे भारत में मुस्लिम युवा विशेषतौर पर काश्मीरी मुस्लिम आसान निशाना बने हुए हैं, पंजाब में आतंकवाद के पुर्न-उभार के नाम पर सिक्ख युवाओं को निशाना बनाया जा रहा है।

विश्व के सर्वाधिक कुख्यात मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले अमरीका और इजरायल न केवल केंद्र सरकार बल्कि कई राज्य सरकारों के सुरक्षा तंत्र में गहरे तक घुस चुके हैं। पिछले ही दिनों इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने कमांडो के पहले बैच को तैयार किया है जिन्हें पंजाब में अति महत्वपूर्ण व्यक्त्यिों की सुरक्षा में लगाया जाएगा। चूंकि वे आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था में और गहरे तक घुसपैठ करेंगे, राज्य सरकारें पुलिस बलों के आधुनिकीकरण के नाम पर प्रशिक्षण और हथियारों के ऊपर और ज्यादा खर्च करेंगी। लेकिन जनता का यह सारा पैसा अंततः अमरीका और इजरायल के सैन्य-उद्योग कम्पलैक्स की जेबों में जाने वाला है क्योंकि उन्हें प्रशिक्षकों के रूप में बुलाया जा रहा है और नए हथियार खरीदने के लिए उनको ठेके दिए जा रहे हैं। उनके भारतीय सहयोगियों (बिचैलिए और राजनीतिज्ञ) को भी कमिशन के तौर पर उनका हिस्सा मिलेगा। राजनीतिज्ञों को बिना किसी जबावदेही के ज्यादा सुरक्षा मिलेगी और पुलिस अफसरों को बिना कानून के भय के ज्यादा शक्तियां हासिल होंगी। आतंकवाद का हौवा खड़ा किये बिना पैसे का दोहन और असीमित शक्तियां संभव नहीं हैं।

पिछले दिनों पंजाब क्रांतिकारी वामपंथी और खालिस्तानी आंदोलन देखने के बाद ‘सामान्य और शांत’ हुआ है। शायद पंजाब एकमात्र ऐसा राज्य है जिसने अपने अतीत में इन दो प्रकार के आंदोलनों का अनुभव किया है जो वैचारिक तौर पर भिन्न थे। लेकिन सामान्य स्थितियों की वापिसी के बावजूद यूएपीए 1967 को गैरजरूरी नहीं माना गया, क्योंकि अभी भी बहुत से लोगों को इस कानून के तहत पकड़ा गया है। उन के खिलाफ षडयंत्र रचने का, हत्या की कोशिश का, युद्ध भड़काने का और ‘बड़ी मुश्किल से हासिल की गयी शांति’ को भंग करने का आरोप लगाया गया है। चूंकि असाधारण परिस्थितियां समाप्त हो गयी हैं इसलिए ‘आतंकवाद के फिर से सिर उठाने को रोकने के लिए’ और ‘बड़ी मुश्किल से हासिल शांति’ को कायम रखने के नाम पर इसे न्यायोचित ठहराया जा रहा है। पंजाब पुलिस ने ‘असाधारण परिस्थितियों से निपटने के लिए असाधारण कानूनों’ के तर्क को मानने से पूरी तरह इंकार कर दिया है।

खालिस्तान आंदोलन के संदर्भ में, सरकार लगातार एक ही बात दोहरा रही है कि खाड़कू संगठन पंजाब में फिर से सिर उठाने की जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं। क्रांतिकरी वामपंथी आंदोलन के मामले में इसका कहना है कि यह सीपीआई (माओवादी) को किसी भी सूरत में पंजाब में अपनी मौजूदगी मजबूत करने नहीं देगी। पिछले कुछ सालों की समाचार रिपोर्टें इस बात का प्रमाण हैं। punjabnewsline.com पर 7 नवंबर 2012 को एक रिपोर्ट आई थी कि ‘पंजाब पुलिस ने 1072 लोगों का रिकार्ड तैयार किया है जो संदेहास्पद की श्रेणी में आते हैं और इनमें से 27 के कट्टर संगठनों के साथ संपर्क हैं या वे खाड़कू संगठनों के साथ सहानुभूति रखते हैं।’

इंडियन एक्सप्रैस (9 अक्तूबर, 2012) लिखता है,‘पंजाब पुलिस के रिकार्ड के अनुसार पिछले दो सालों में 21 खाड़कुओं को गिरफ्तार किया गया है। जिनमें से 11 वर्ष 2011 में और 10 को सितंबर, 2012 तक पकड़ा गया था। कुल मिला कर पिछले पांच सालों में 184 खाड़कुओं को गिरफ्तार किया गया है जबकि 5 ने आत्मसमर्पण किया है।’ लेकिन बीएसएफ के पूर्व डायरेक्टर प्रकाश सिंह इंस्टीच्यूट आॅफ कनफ्लिक्ट मैनेजमेंट द्वारा जुटाए आंकड़ों का हवाला देते हैं कि पिछले दशक (2001-2011) में कुल 134 खाड़कू गिरफ्तार किये गये थे। मई 26, 2010 को पंजाब के डीजीपी ने प्रैस को एक बयान दिया था कि पिछले 6 महीनों के दौरान विभिन्न खाड़कू संगठनों के 63 खाड़कुओं को गिरफ्तार किया गया है जिनमें बब्बर खालसा इंटरनेशनल (बीकेआई), खालिस्तान लिबरेशन फोर्स (केएलएफ), और खालिस्तान कंमाडो फोर्स (केसीएफ) के खाड़कू शामिल हैं और उनके 17 मोडूयल ध्वस्त किये गये हंै। राष्ट्रीय जांच एजंेसी ने पंजाब में मिलिटैंसी को फिर से उभारने के लिए फण्ड देने के आरोप में बीकेआई के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की है।

माओवादी चुनौती के मामले में डीजीपी ने कहा है कि ‘राज्य में माओवादियों के 15 फ्रंट संगठन सक्रिय हैं। वे अपने आधार को फैलाने के लिए खुले तौर पर छात्रों, किसानों और मजदूरों के हितों के नाम पर काम कर रहे हैं।’ द ट्रिब्यून द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट (जून 23, 2010) में कहा गया कि ‘बढ़ते माओवादी खतरे से निपटने के लिए क्षमताएं विकसित करने हेतु पंजाब पुलिस ने 100 करोड़ रुपए की विशेष केंद्रीय सहायता की मांग की है…. राज्य पुलिस ने एक विशेष खुफिया विभाग भी गठित किया है और संभावना है कि वह इसके लिए विशेष बलों का गठन करेगी और उन्हें सुसज्जित करेगी।’ यद्यपि गिरफ्तार किए गए तथाकथित माओवादियों की संख्या तथाकथित खाड़कुओं से कम है, लेकिन उनसे संभावित खतरे को उतना ही गंभीर माना जा रहा है जितना कि खाड़कुओं से है। यहां तक कि आप्रेशन ग्रीन हंट की भत्र्सना करने वाले पोस्टरों को भी राज्य पुलिस ने राष्ट्रविरोधी गतिविधी के रूप में चिन्हित किया है।

हरियाणा के मामले में पिछले 10 सालों में 100 से ज्यादा लोगों और कार्यकत्र्ताओं के खिलाफ 124-ए आईपीसी, 121-ए आईपीसी, यूएपीए,1967 और अन्य काले कानूनों के तहत मामले दर्ज किये गये हैं। सिक्ख खाड़कू संगठनों के पुनर्गठन और उनके द्वारा हरियाणा में संभावित आतंकी हमलों का डर दिखा कर डेरा सच्चा सौदा का मुद्दा खड़ा किया गया। दूसरा ग्रुप मजदूरों, किसानों, छात्रों और सांस्कृतिक संगठनों के कार्यकत्र्ताओं और नेताओं का है जिनके खिलाफ केस दर्ज किये गये हैं। उन्हें तथाकथित ‘माओवादी’ कह कर उनकी आजादी का गला घोट दिया गया है। क्रांतिकारी मजदूर किसान यूनियन (केएमकेयू) कृषि उत्पादों की कीमतों, न्यूनतम समर्थन मूल्य, किसानों को सब्सिडी जारी रखने जैसे मुद्दों पर ग्रामीण मजदूरों और गरीब किसानों को संगठित कर रही थी। इसने भूमि सुधारों के मुद्दे की धुरी पर संघर्ष को केंद्रित किया हुआ था जिसे न केवल हरियाणा सरकार भूल चुकी है बल्कि जिसे अन्य संगठनों ने भी भुला दिया है।

राज्य सरकार ने इन जनवादी मांगों का प्रतिकार इन्हें देशद्रोही घोषित करते हुए क्रूर दमन के साथ किया। न केवल केएमकेयू के नेतृत्व, कार्यकत्र्ता और समर्थकों को बल्कि उन्हें खाना, आश्रय और फण्ड आदि देने वाले आम लोगों के खिलाफ भी काले कानूनों के तहत मामले दर्ज कर लिये गये और 50 के लगभग लोगों को सलाखों के पीछे डाल दिया गया। इस संगठन ने शहरी गरीब लोगों के रहने के प्लाटों के मुद्दे पर भी संघर्ष किया है। उन्हें प्लाट आबंटित करने के स्थान पर लोगों को राष्ट्रविरोधी घोषित कर दिया गया और बूढ़ों, बच्चों और औरतों सहित 15 के लगभग कार्यकत्र्ताओं के खिलाफ इन काले कानूनों के तहत मामले दर्ज कर लिये गये।

जागरूक छात्र मोर्चा (जेसीएम), एक छात्र संगठन, ने छात्रों को कई मुद्दों पर संगठित किया जैसे शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ, बढ़ती फीसों को कम करने के लिए, लोगों को अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा मुहैया करवाने के लिए। इसके अलावा उन्होंने भूमिहीन गरीबों के संघर्षों में भी भाग लिया। वर्ष 2007 में उन्होंने नरवाना से चण्डीगढ़ तक एक साईकल मार्च का आयोजन किया जो निजी विश्वविद्यालय बिल के खिलाफ था। हरियाणा सरकार के द्वारा इसे देशद्रोही गतिविधी घोषित कर दिया गया और बहुत से छात्रों के खिलाफ केस दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें 8 से 9 महीने जेलों में गुजारने पड़े क्योंकि सेशन कोर्ट ने उन्हें जमानत देने से मना कर दिया। उनकी रिहाई तभी संभव हो पायी जब पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने उन्हें जमानत दी। दोनों राज्यों में आमतौर पर कार्यकत्र्ताओं को कोर्ट में पेश करने से कई दिन पहले पकड़ लिया गया था और उन्हें गुप्त यातना गृहों में रख कर क्रूर शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी गयीं। राज्यों में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस इन गिरफ्तारियों को उचित ठहरा रही है।

अंत में हम यह कहना चाहेंगे कि भारत के शासक वर्गों के विकास के माडल और उनकी भारतीय राष्ट्र की अवधारणा का विरोध करने वाली भारतीय जनता का गला घोंट कर उन्हें चुप करवाने के लिए इन सभी दमनकारी कानूनों और व्यवस्थाओं को या तो भारतीय कानून व्यवस्था में बरकरार रख लिया गया या इन्हें नए कानूनों के रूप में अपना लिया गया। राजसत्ता इतनी अधिक व्यग्र हो चुकी है कि वह किसी भी गतिविधी को देश के खिलाफ घोषित कर देती है और इन कानूनों का इस्तेमाल फेसबुक और ट्विटर का इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ, जीतन मरांडी और कबीर कला मंच जैसे सांस्कृतिक कार्यकत्र्ताओं के खिलाफ, पत्रकारों, सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकत्र्ताओं के खिलाफ और अन्य कई प्रकार के लोगों के खिलाफ जो अपनी सरकारों से भिन्न राय रखते हैं, कर रही है। लेकिन इस दमन से घबराए बिना जन आंदोलन राजकीय उत्पीड़न के खिलाफ अपने संघर्षों को जारी रखे हुए हैं ताकि वे न्याय के अपने स्वप्न को वास्तविकता में बदल सकें। एक प्रख्यात इतिहासकार हार्वड जिन ने सही कहा है कि ‘कानून से इत्तर (कानून के खिलाफ भी) संघर्ष लोकतंत्र से प्रस्थान नहीं होता; उल्टे ये इसके लिए बेहद जरूरी होता है।’ चूंकि न्याय के बिना लोकतंत्र संभव नहीं है, इसलिए एक न्यायपूर्ण समाज के लिए जनता के संघर्ष मौलिक तौर पर लोकतंत्र के लिए संघर्ष होते हैं। दमनकारी कानून और व्यवस्थाएं असल में भारतीय राजसत्ता की ओर से न्याय और लोकतंत्र की अवधारणा को ही आपराधिक बनाने की जानबूझ कर की गयी कोशिशें हैं। वे भारतीय संघ को और ज्यादा जनविरोधी, फासीवादी, और निरंकुश सत्ता मे बदलने की ओर जा रहे हैं। वे सार रूप में पूरी तरह से लोकतंत्र विरोधी हैं।

वक्ता

दमनकारी कानूनों से पीड़ित,

राजविन्द्र सिंह बैंस एडवोकेट (पंजाब ह्यूमैन राइट आर्गेनाइजेशन, पीएचआरओ)

प्रो. जगमोहन सिंह (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट, पंजाब, एएफडीआर )

पंकज त्यागी (पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल राइट, हरियाणा, पीयूसीआर)

एसिसटैंट प्रो. जतिन्द्र सिंह (अहद),

आरती, एडवोकेट (लोकायत, चण्डीगढ़)

दमनकारी कानूनों के खिलाफ कमेटी, चण्डीगढ़

संपर्क: आरती-09779110201
साभार: अजय कुमार

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