संघर्ष संवाद
Sangharsh Samvad

कूडनकुलम: बर्बर दमन के बीच जारी जनांदोलन को देश भर से समर्थन


कूडनकुलम में परमाणु-रिएक्टर के खिलाफ चल रहा आंदोलन निर्णायक दौर में पहुँच गया है. पिछले महीने की शुरुआत में परमाणु बिजलीघर के अंदर यूरेनियम ईंधन डालने की घोषणा के बाद आंदोलन तेज हुआ है और अदालती स्तर से लेकर देश भर में व्यापक जन-समर्थन जुटाने तक की पुरजोर कोशिश जारी है.

मद्रास उच्च न्यायालय में रिएक्टर परियोजना को रोकने की अर्जी खारिज होने के बाद परमाणु ऊर्जा कार्पोरेशन ने जहां तत्काल कूडनकुलम में ईंधन भरने की घोषणा कर दी, वहीं आंदोलन के समर्थकों ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के साथ ही ज़मीन पर आंदोलन तेज कर दिया. 9 सितम्बर को लगभग बीस हज़ार लोग कूडनकुलम परमाणु रिएक्टर की पूर्वी दीवार के पास प्रदर्शन करने को पहुंचे तो सरकार पुलिसिया दमन पर उतारू हो गई.
10 सितम्बर को शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हज़ारों मछुआरों, महिलाओं और बच्चों पर बर्बर ढंग से लाठी-चार्ज किया गया है और आंसू गैस के गोले दागे गए. इस हमले से बचने का एकमात्र जरिया समुन्दर में कूदना था. पूरे दिन चले इस पुलिस हमले में जहां एक मछुआरे की गोली लगाने से तत्काल मृत्यु हो गयी, वहीं अगले दिन से शुरू हुई हवाई पेट्रोलिंग में एक और व्यक्ति की आघात से मौत हो गयी. लगातार कई दिनों तक पुलिस खुलेआम इदिन्थाकराई और अन्य निकटवर्ती गांवों में लोगों को प्रताडित करती रही. कम-से-कम पचास लोग इस हमले में बुरी तरह घायल हुए और सौ से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया. गाँव के अंदर घुसकर पुलिस ने मछोआरों के घरों और नावों को तोड़ दिया. महिलाओं, बूढों और बच्चों तक को नहीं बख्शा गया. पुलिस ने आंदोलन के शीर्ष नेता एस.पी.उदयकुमार को गिरफ्तार करने का बहाना बना कर यह उत्पात कई दिनों तक मचाया. लेकिन आंदोलन ऐसे वीभत्स दमन के बावजूद थमने का नाम नहीं ले रहा है. जब खुद एस.पी.उदयकुमार ने अपने आप को पुलिस को सौंपने की घोषणा की तो स्थानीय लोग उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले गए और उनकी गिरफ्तारी से मना कर दिया.

मुंबई उच्च न्यायालय के पूर्व-न्यायाधीश बी.जी. कोलसे-पाटिल की अगुवाई में एक स्वतंत्र जांच दल ने कूडनकुलम में हुए पुलिसिया दमन पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट में सरकारी कारवाई की भर्त्सना की और इस बर्बर दमन का पूरा ब्योरा प्रकाशित किया. इस परियोजना में पर्यावरणीय सवालों और लोगो के जीवनयापन तथा सुरक्षा के सरोकारों की पूरी तरह अनदेखी हो रही है. आंदोलन से जुड़े आठ हज़ार लोगों पर सरकार ने देशद्रोह के मुकदमे लगा दिए हैं. बुज़ुर्ग और बच्चे तक देशद्रोह के आरोप का सामना कर रहे हैं.

पूरे देश के जन-संगठन, जनपक्षीय पार्टियों और कई वरिष्ठ बुद्धिजीवी इस दमन के खिलाफ खुलकर सामने आए. दिल्ली में जंतर मंतर, इंडिया गेट और तमिलनाडु भवन के सामने लोगों ने अपना विरोध जताया. ऐसे ही विरोध-प्रदर्शन चेन्नई, मुंबई, कलकत्ता, हैदराबाद, पुणे, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और तमिलनाडु के कई छोटे-बड़े शहरों में भी हुए.

11   सितम्बर 2012 को तीन हज़ार आम लोग कूडनकुलम में समुद्र के पानी में ‘जल सत्याग्रह’ शुरू किया । परमाणु रिएक्टर परियोजना को खुद पर थोपे जाने और इसके खिलाफ चल रहे आन्दोलन के कार्यकर्त्ताओं पर बर्बर पुलिसिया दमन के विरोध में महिलाएं, बच्चे और साधारण मछुआरे इस सत्याग्रह में हिस्सा ले रहे थे.

इस दमन के खिलाफ और जनांदोलन के समर्थन में महाश्वेता देवी, अरुंधती राय, अरविंद केजरीवाल आदि  प्रमुख सामाजिक हस्तियाँ तथा कई मानवाधिकार संगठन खुलकर सामने आए.

12   सितम्बर 2012 को कुडनकुलमके समर्थन में लखनऊ में विरोध-प्रदर्शन हुआ. जिसमे मांग कीगई कि सरकार कुडनकुलम ही नहीं बल्कि जैतापुर, महाराष्ट्र, मीठी विर्डी, गुजरात, गोरखपुर, हरियाणा, चुटका, मध्य प्रदेश, कोवाडा, आंध्र प्रदेश, आदि, जहां-जहां नाभिकीय बिजली घर लगाना चाह रही है अपनी योजना वापस ले।

15   सितम्बर 2012 को कुडमकुलम के परमाणु संयत्र विरोधी आंदोलन पर किये जा रहे दमन के खिलाफ रावत भाटा परमाणु संयत्र के श्रमिकों ने अपनी नाराजगी जाहिर की. अणु शक्ति डी आर मिक संघ (रावत भाटा) श्रमिक हितों के लिये परमाणु संयंत्र प्रबंधन की मनमानियों से जूझ रहा है. श्रमिक संघ ने इस संदर्भ में प्रधानमंत्री को भी पत्र लिखा. जिसकी शुरुआत कुडमकुलम के बेकसूरों के साथ किये जा रहे अन्याय की निंदा से की गयी है.

16 सितम्बर 2012 को केरल से कुडमकुलम आंदोलन के सैकड़ों समर्थकों ने त्रिवेंद्रम से कुडमकुलम तक विरोध-मार्च निकाला जिसे तिरुनेलवेली और कन्याकुमारी में पुलिस के द्वारा रोक लिया गया और इन कार्यकर्त्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया.

17 सितम्बर 2012 को मछुआरों के राष्ट्रीय संगठन ने पूरे देश में हडताल का आयोजन किया.

19 और 20 सितम्बर को मुंबई उच्च न्यायालय के पूर्व-न्यायाधीश बी.जी. कोलसे-पाटिल की अगुवाई में एक स्वतंत्र जांच दल ने कुडमकुलम का दौरा किया.

28 और 29 सितम्बर को दिल्ली में आयोजित ‘फर्जी केसों पर राष्ट्रीय जनसुनवाई’ में भी कुडमकुलम में हुए दमन और हज़ारों फर्जी केसों का मामला उठाया गया. इस सुनवाई में आए बिनायक सेन जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने तमिलनाडु सरकार की निदा की.

इस बीच प्रशांत भूषण ने सर्वोच्च न्यायालय में कुडमकुलम का मामला उठाया और वहाँ हुए प्रावधानों की अवहेलना को केंद्र में रखते हुए रिएक्टर के उदघाटन को रोकने की मांग की है. परमाणु ऊर्जा नियमन बोर्ड ने मद्रास हाईकोर्ट में शपथपत्र देकर 17 सुरक्षा-शर्त्तों पर कारवाई होने के बाद ही रिएक्टर के शुरू होने को मंजूरी देने की बात कही थी. लेकिन उच्च न्यायालय में वह अपनी बात से मुकर गया है और यह कहा है कि उक्त 17 सुरक्षा-शर्तें बाध्यकारी नहीं है बल्कि मात्र सुझाव-भर है. देश भर के लोकतांत्रिक आन्दोलनों और परमाणु-विरोधी समूहों ने इसकी निंदा की है.

कुडमकुलम मामले पर अगली सुनवाई चार नवंबर को होनी है जिससे उस इलाके के हज़ारों मछुआरों की सुरक्षा और ज़िंदगी का सवाल जुड़ा हुआ है. इस मुद्दे पर व्यापक जागरूकता के द्वारा ही इस लड़ाई को जीता जा सकता है.

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